bond007
8th December 2011, 09:50 AM
आदि काल में एक ऐसा विचित्र संयोग हुआ था कि एक राजा अपने राज पाट से तंग आ गया था और उसे काम-काज में बिलकुल रूचि नहीं लगती थी. राज वैद्य को बुलाया गया और उसने कुछ ऐसे औषधियों का उनपर प्रयोग किया कि राजा को अचानक से काम-काज कि जगह कामुक-कार्यों में अतीव रूचि जाग गयी. बस फिर क्या था, उसने अपनी प्रजा की बजानी शुरू कर दी. उसने प्रति दिन एक नयी मोहनी को राज दरबार में शामिल होने का आदेश दे दिया. इस विशेष कार्य के लिए उसने एक विशेष दस्ते की नियुक्ति की जिसके हर सदस्य को सुन्दरता के उन पहलुओं को परखने की विशेष दक्षता थी जिनसे सदियों से नर प्रजाति के कमर के नीचे व दोनों पैरों के मध्य में स्थित अंग में तनाव की प्रक्रिया स्वतः अनुभव होने लगती है. राजा ने इस विशेष कार्य के लिए अपने दरबार से ऐसे ऐसे प्रचंड कामुकों का चुनाव किया था, जो हर वक्त इसी सोच में रहते थे कि "मौका मिले तो किसी की भी बजा दूँ". ऐसे कामुकों के जीवन का सिर्फ एक ध्येय होता था की अपने यौवन के प्रारंभ काल से घर्षण के सिद्धांत पर पूरी अमल की जाए.उनमे कई ऐसे थे जो दरबार में चल रहे लम्बे विचार विमर्श के मध्य हस्त मैथुन जैसे विशेष कार्य में ही अक्सर लीन पाए जाते थे. उन सबों के "काम" के प्रति ऐसी अभिरुचि और समर्पण ने उन्हें स्वतः इस विशेष कार्य के लिए उपयुक्त विकल्प बना दिया था. राजा चूँकि ऐसे ऐसे काम-रत्नों के मंशा और प्रवृति स्वंय से जानकार था, अतः उसे पूरी आशंका रहती थी की राज दरबार में जो भी आहार वे प्रस्तुत करेंगे, उसे वे चख कर जूठा बनाने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे. इस भय से उसने इस दस्ते को मोहनियों के खोज में जाने के पूर्व इतनी बार मैथुन क्रिया का आदेश दे रखा था कि अंतिम बार में बहुत घर्षण के बावजूद भी उसी तरह से बूँद गिरे जैसे म्युनिसिपलिटी के नल से पानी... ! राजा का ऐसा विश्वास था कि "रक्षक ही भक्षक" न बन जाये, अतः अपने विशेष दस्ते के सदस्यों को "काम" के प्रति इतना आसक्त बना दिया जाए कि वे अपने स्वाभाव के अनुसार आँखों से जितना चाहे चक्षु-सम्भोग करे पर अगर उसे वास्तव में क्रियान्वित करने का प्रयास करे तो वे वैसे ही स्वंय को विवश पाए जैसे कोई गूंगा चीखने कि कोशिश करे और ऐसा अनुभव करें जैसा प्रसिद्द गाना "सागर कितना मेरे प्यास है फिर भी मेरे दिल में प्यास है.." के भावार्थ से परिलक्षित होता है कि प्यासा मनुष्य सागर के खारे पानी के पास होते भी उसे पी न सके....
राजा के द्वारा बनाये इस व्यवस्था से जहाँ प्रजा की पूरी तरह से लग गयी थी वही राजा जो अपने काम से बिलकुल उदासीन हो गया था, उसे अचानक से राज पाट में बहुत मज़ा आने लगा था. अब तो वह राज-दरबार में भी खुले आम सुंदरियों को अपने गोद में बिठा कर वात्स्यायन के लिखित संदेशों का सामूहिक क्रियात्मक प्रदर्शन करता रहता था. राज दरबार में भी जहाँ कई सदस्य अब खुले आम हस्त मैथुन करने लगे थे, तो वही कई राजा द्वारा अस्वीकृत सुंदरियों को साथ लाकर उन के साथ सभा के मध्य ही काम के विभिन्न आसनों का प्रयोग करने लगे थे. और भीड़ से सदा अलग अपना जगह बनाने वाले कुछ ऐसे भी थे जो जरा हट कर थे और वे किसी भी तल्लीन सदस्यों को ऊँगली इत्यादि जैसे ओछी हरकते करने से भी बाज नहीं आते थे.
प्रजा के बारे में जैसा पहले ही कहा जा चुका है, "यथा राजा तथा प्रजा", अतः उसी के प्रतिरूप, प्रजा ने भी ये मान लिया था कि ऐसे ठरकी राजा के रहते किसी भी वैसे सुंदरियाँ जिनके अंगों से मादकता चूती रहती हों उनका पहले ही विवाह कर दिया जाए अन्यथा वे राजा के भोग विलास के कार्य में लगा दी जायंगी. मगर राजा को उस विशेष प्रकार के धुनकी का नशा लग गया था जिसका सदियों से वैद्य-चिकत्सक आज तक हल निकलने में असमर्थ हैं. अतः, राजा को यह भांपते देर नहीं लगा कि अगर ऐसा होने लगे कि हर नयी फसल को कोई और काट के ले जाएगा तो उसकी मांग कि आपूर्ति में बहुत भीषण समस्या आने लगेगी और उसके इस धुनकी का फिर कोई इलाज़ नहीं हो पायेगा. स्वाभाविक रूप से उसने राज्य में होने वाले हर विवाह कि स्वकृति राजा से लेना आवश्यक कर दिया. इस से राजा को एक और फायदा हो गया. जैसे भीषण गर्मी में सूखे जंगल के सभी प्यासे विवश जीव जंतु पानी पीने के लिए जान जोखिम में डाले उसी घाट पर आते हैं जहाँ शेर आराम से बैठा रहता है और फिर शेर को शिकार करने के लिए ज्यादा दूर तक दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है, उसी तरह से अब उसे राज्य में जवानी के दहलीज़ रखती हर कलियाँ जिसे फूल बनाया जा सकता था उनकी जानकारी उसे बैठे बिठाये मिलने लगा.
अंततोगत्वा इस तरह के व्यवस्था में जैसा होता है, प्रजा ने घुटने टेक दिए और राजा से अनुरोध किया कि अब वह जो निर्णय देंगे वो उन्हें स्वीकार्य होगा. राजा ने विवश और बजने को तैयार प्रजा कि भावनाओं को समझते हुए मौका पर चौका मार कर इसका पूरा फायदा उठाया और एलान किया कि अब से जवानी के दहलीज़ में रख चुकी, गदराई हुयी सुंदरियां दरबार में स्वंय आ जाये और हर रोज जिस किसी सुंदरी को पसंद किया जाएगा, उसे वह मालामाल कर दिया करेगा. फिर क्या था राजा के दरबार में सुंदरियों के तांते लगने लगा था. अब तो राज-दरबार में शिकायत कि कम आवेदन कि पर्चियां लिए लोग क़तर में घंटो खड़े दिखने लगे. "निवेशकों" के ऐसे भावना को देखते, राजा ने अब अपने उस विशेष दस्ते की आवश्यकता नहीं समझी और उनकी छुट्टी कर दी.
प्रसिद्ध हिंदी चल-चित्र शोले के बुढिया मौसी के कथनानुसार "ये शराब और जुए की आदत किसी की छूटी है आजतक ", तदानुसार, इस विशेष दस्ते की भी बचपन से लग चुकी काम वासना की आदत अब इस कदर बढ़ चुकी थी कि वह इस जीवन काल में ख़तम नहीं होने वाली थी. विशेष दस्ते में कुछेक तो इतने बेचैन हो गए थे कि वे राज्य छोड़ किसी नए ठरकी राजा के ओर पलायन करने की सोचने लगे थे. उधर राजा भी धीरे धीरे इस तरह से रोज रोज आराम से मिलने वाले सुंदरियों से उबने लगा था. कारण दो थे- एक राज्य कि सीमित जनसँख्या के कारण धीरे धीरे उसे अपना स्तर गिरना पड रहा था वही बिना भाग दौड़ किये शिकार मिल जाने से उसके अन्दर अथक प्रयास से मिले सफलता और संतुष्टि कि भावना जागृत नहीं हो पा रही थी. उसे अपने पुराने खोजी दस्ते का ख्याल आया और उसने उन सबों को फिर से राज दरबार में आमंत्रित किया. राजा ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उसे अब वह इस व्यवस्था से उब चुका था और उसे कोई बदलाव चाहिए थी, अतः राज्य के बाहर के कुछ सुंदरियों का भी मज़ा चखने जैसे शौक अब उसे चर्राने लगा है. विशेष दस्ते को यह अत्यंत विचारोद्देतक सुझाव लगा. वे तो इसी तरह के काम के लिए उपयुक्त भी थे एवं ऐसे कामों में उनका अनुभव अतुलनीय था. इस तरह के कार्य में उनकी गहरी अभिरुचि भी थी. राज-कोष से उन्हें विदेश जाने कि व्यवस्था की जाने लगी और वे अलग अलग देशों से जा कर राजा के लिए विदेशी सुंदरियों का चयन कर लाने लगे.
राजा के उबते हुए काम-क्रिया में इस तरह के विदेशी निवेश से एक नयी तरह की लहर दौड़ पडी थी और जिस तरह कॉन्फरन्स में हर शाम के डिनर में मिलने वाले खाने कि प्रतीक्षा होती है, उसी तरह से उसे हर रात के "व्यंजन" का बेसब्री से इंतज़ार रहता था. चूँकि विदेशी सुंदरियाँ इतनी दूरी तय करके आती थीं, उनका जल्द वापस लौटना संभव नहीं होता था, अतः उनका राज महल में ही रहने की व्यवस्था की जाने लगी. सुंदरियाँ अपने रात्रि काल के कार्यक्रम के पश्चात् राजा की विशेष कृपा पाने के लिए अपने देश की विशेष कलाओं का प्रदर्शन करने लगी. राजा अब पूरी तरह से इस तरह के क्रियाओं में लीन रहने लगा था. प्रजा का यह हाल था की मंदिर के घंटे की तरह जब कोई भक्त मंदिर में आ जाये तो बजता था अन्यथा वो बजने के लिए कभी भी तैयार लटका रहता था. विशेष दस्ते की तो वारे न्यारे हो गए थे, अब तो उन्हें विदेशों में तरह तरह के सुंदरियों को सरकारी खर्च पे बजाने का अवसर मिलने लगा था.
सब कुछ वैसे ही चल रहा था जैसा होना चाहिए था, प्रजा की इतनी बज चुकी थी की अब लोगों ने काम काज करना बंद कर दिया था और राज्य में दिन रात महंगाई बढ़ने लगी और लोगों का जीना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा था. राजा दिन पर दिन काम वासनाओं में इतना ज्यादा लीन होने लगा था की उसे समाज का दर्द उसी तरह से समझ में नहीं आ रहा था जैसा हिंदी चल चित्र में बुढी माँ के कराहते दृश्य में हीरो को रोते दिखने के बावजूद अगले दृश्य में उसे अपने प्रेमिका के साथ बरसात के दृश्य में काम-क्रीडा में लीन दिखाया जाता है. ऐसा कहा भी जाता है की जब किसी के दिमाग में काम और वासना सवार हो तो उसे और कुछ भी नज़र नहीं आता है. देश का ये हाल होने लगा था की अब कई विदेशी सुंदरियाँ राजा की विशेष कृपा से धीरे धीरे बसने लगे थे. चूँकि उन्हें लोक लाज का कोई भय नहीं था और उनके आसपास आने वाले नर प्रजाति के अधो-भाग में तनाव जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया स्वतः होती रहती थी, अतः उन्हें हर रात्रि कल में एक पुरुष साथी आराम से मिल जाने लगे, जो अपनी पूरी संपत्ति इनपर न्योछावर करने को तैयार होते थे. धीरे धीरे क्या विवाहित और क्या बूढ़ा और क्या जवान, सभी इन सुंदरियों के पास उसी तरह मंडराने लगे जैसे हलवाई के दुकान में जलेबी के ऊपर मक्खियाँ.
राज्य की सुंदरियाँ में भी, जिन्हें इतना आत्म-विश्वास था की उनके पास विदेशियों से प्रतिस्पर्धा करने योग्य अंग-प्रत्यंग में वो सुडौलपन था जो पुरुषों में स्वतः तनाव पैदा कर सके, उन्होंने भी अपना स्व-रोजगार के अवसर खुद ही खोज निकले. इस तरह सारा राज्य काम वासना के स्वर्णिम युग में था. परन्तु जैसा हर युग में होता आया है , स्वादिष्ट भोजन के बीच एकाध कंकर खाने का जायका ख़राब करने के लिए आ ही जाता है, उसी प्रकार से राजा को उसके मंत्री, जिसकी अहमियत अब तक इतनी काम हो चुकी थी जैसे डिजिटल कैमरा आने के बाद फिल्म रोल, उसे बहुत ज्यादा खुजली होने लगी और उसने जब ऐसे बढ़ते यौन-रोजगार कि शिकायत दे मारी तो राजा ने उस पर वैसे ही जम्हाई मारी जैसे किसी टेस्ट मैच में स्पिनर के मैडेन ओवर पर आती हो. राजा ने झूले पर अंगूर के दाने को चबाते और गोद पर बैठे सुंदरी के उरोजो को दबाते हुए, मंत्री को कुछ सार्थक विषयों पर ध्यान देने जैसे नेक सलाह दे कर खिलखिलाते हुए सुंदरियों के नितम्बों पर हाथ फेरने जैसे आवश्यक कार्य का प्रारंभ कर दिया जिसे देखते ही समझदार मंत्री को अंदाज़ा हो गया था कि आगे राजा अपने शरीर के तने हुए विशेष अंग का विशेष प्रयोग उस सुंदरी पर कुछ ही क्षणों में करने वाले थे और यदि समय रहते वह प्रस्थान न करे तो राजा उसके साथ भी वही करेंगे जो शाब्दिक रूप से वही कहा जायेगा जो उस सुंदरी का होने वाला था अर्थात उसकी भी बजा दी जाएगी. मंत्री एवं अन्य परामर्शकर्ताओं कि उपेक्षा एवं अवहेलना से विक्षिप्त राज-तंत्र कि सभी इकाइयाँ अब मानो मौन व्रत धारण कर अवकाश पर चली गयी थी. राज्य में पूरी तरह से अराजकता फ़ैल गयी थी. जिधर देखो बजने और बजाने का कार्यक्रम चल रहा था.
राज दरबार में कभी मुन्नी तो कभी शीला अपनी जवानी दिखा कर बदनाम हो रही थी और दबंग राजा बिलकुल चुलबुलाते हुए एक के बाद एक हिट दे रहे थे. तभी राज्य से लगा हुआ मधुवन नामक जंगल का खूंखार डाकू कालू लंगड़ा कि मदद लेने लोग जंगल पंहुचे. पहले तो बरसों का दोनों, कमर के ऊपर और नीचे का भूखा कालू लंगड़ा लोगो को देख कर चकित हुआ और सोचा कि गाँव को लूटने के बजाय खुद गाँव वाले लुटने के लिए जंगल चले आये हैं. पहले तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता था कि जिसे देख कर लोग भाग जाते थे आज उसके पास लोग चले आ रहे थे. मगर उसे ये नहीं पता था कि डाकू कालू लंगड़ा तो कभी कभी जंगल से बाहर लूटने को निकलता था मगर राजा तो रोज ही प्रजा कि बजा रहा था. डाकू कालू लंगड़ा पहले तो उत्साहित, फिर प्रसन्न, और फिर विस्मित हुआ और गाँव वालों कि दुःख भरी कहानी सुन कर राजा की किस्मत पर अन्दर से तो बहुत जला, मगर उसके चारो तरफ जब लोगों ने सहायता कि भीख मंगनी शुरू कर दिया तो वो न चाहते हुए भी एक मसीहा बन गया, हालाकि उसे अन्दर से वही करने का मन था जो राजा कर रहा था मगर अब वह बहुत विवश हो गया था. अब वह उसी तरह से अपनी जिम्मेदारियों से बंध गया था जिस तरह हिंदी फिल्म का इंस्पेक्टर. उसने लोगों को बताया कि वह उसे राजा से मुक्ति दिला देगा मगर बदले में उसे राजा कि गद्दी चाहिए थी, लोगों कि हालत ऐसी थी कि शरीर के जितने छिद्र थे उन सबों में राजा ने मानो कुछ कुछ न घुसेड दिया था, अतः उन्हें ये शर्त बिलकुल मान्य हो गयी.
अपने रंग के अनुसार अमावास की रात को डाकू कालू लंगड़ा ने अपने दल के साथ जंगल से राज महल के लिए कूच की. रास्ते में हर जगह लोगों ने उस से डरने की बजाय उसकी स्वागत की और फिर वह जब महल के पास पहुंचा तो पहरेदारों ने भी उसे रोकने की कोशिश की. परन्तु डाकू कालू ने उन सबों को अपनी आगे कि योजना बताई जिसमे उन्हें मालामाल करने की बात फर्श पर गिरे सिक्के की आवाज की तरह उनके कानों में पहुँच गयी थी. उन्होंने राज महल के द्वार को उसी तरह से खोल दिया जिस तरह से राजा हर रात अपने पैजामा कि नाडा खोल देता था. अन्दर जाने के बाद डाकू कालू लंगड़े ने अपने बरसों के अनुभव के आधार पर राजा कि हत्या उतनी ही आसानी से कर दी जितनी आसानी से राजा अपने महल में रोज सुंदरियों की बजाया करता था. सबकुछ इतनी आसानी से हो गया कि किसी को समझ में भी नहीं आया.
डाकू कालू लंगड़ा ने बिना समय व्यर्थ किये अगले ही दिन राज्याभिषेक कि घोषणा कर दी. प्रजा बहुत प्रसन्न थी और लोगों ने राहत की साँस ली कि घोर पापी और असुर स्वाभाव के राजा से उन्हें मुक्ति मिल गयी थी. राज्याभिषेक के दौरान प्रजा को पता चला कि डाकू कालू लंगड़ा असल में उसके व्यवसाय के हिसाब से रखा गया नाम था. उसके भी माँ बाप ने उसेद कोई नाम दी थी जिसे कालांतर में लोगों ने भुला दिया था. उसने प्रजा को बहुत सारे आश्वासन दिए और बड़े बड़े वायदे किये. और इस तरह से डाकू से राजा बन जाने के बाद धीरे धीरे प्रजा कि सुख शांति वापस आने लगी.
तभी पुराने राजा के बनाये विशेष दस्ते ने उसी तरह से कालू लंगड़े के पास पहल कि जिस तरह से पार्क से मूंगफली बेचने वाले पुलिस के द्वारा खदेड़ कर भगा दिए जाने के पश्चात् पुनः प्रकट हो उठता है और फिर से उसे बेचने का प्रयास धीमे स्वर में करता है. पहले तो नए राजा ने इसका पुरजोर विरोश किया और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने की धमकी दी पर जिस तरह डायटिंग कर रहे व्यक्ति के सामने बार बार अच्छे खाने का प्रस्ताव रखा जाए तो बारम्बार ठुकराने के पश्चात अंत में उसका सब्र का बाँध टूट ही जाता है, उसी तरह कालू लंगड़े की भी नीयत बदल गयी. बस फिर क्या था धीरे धीरे महल में पहले जैसी व्यवस्था चालू हो गयी. प्रजा में पहले बहुत निराशा हुयी तत्पश्चात वे सोचने लगे कि कलयुग आ गया है. किसी ने पहले और नए राजा के तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ कर दिया और जिनको जैसा समझ में आया वैसा करने लगे.
और वह प्रथा आज तक चल रही है. कुछ समझदार लोगों ने इस व्यवस्था का नाम लोकतंत्र रख दिया, और लोगों में इस से कुछ संतोष हुआ और फिर सब व्यवस्था यथावत चलती रही, परन्तु लोगों ने अपने अपने त्वचा को काफी मोटी कर ली और अब उन्हें चिकोटी काटने से भी फर्क नहीं पड़ता.
राजा के द्वारा बनाये इस व्यवस्था से जहाँ प्रजा की पूरी तरह से लग गयी थी वही राजा जो अपने काम से बिलकुल उदासीन हो गया था, उसे अचानक से राज पाट में बहुत मज़ा आने लगा था. अब तो वह राज-दरबार में भी खुले आम सुंदरियों को अपने गोद में बिठा कर वात्स्यायन के लिखित संदेशों का सामूहिक क्रियात्मक प्रदर्शन करता रहता था. राज दरबार में भी जहाँ कई सदस्य अब खुले आम हस्त मैथुन करने लगे थे, तो वही कई राजा द्वारा अस्वीकृत सुंदरियों को साथ लाकर उन के साथ सभा के मध्य ही काम के विभिन्न आसनों का प्रयोग करने लगे थे. और भीड़ से सदा अलग अपना जगह बनाने वाले कुछ ऐसे भी थे जो जरा हट कर थे और वे किसी भी तल्लीन सदस्यों को ऊँगली इत्यादि जैसे ओछी हरकते करने से भी बाज नहीं आते थे.
प्रजा के बारे में जैसा पहले ही कहा जा चुका है, "यथा राजा तथा प्रजा", अतः उसी के प्रतिरूप, प्रजा ने भी ये मान लिया था कि ऐसे ठरकी राजा के रहते किसी भी वैसे सुंदरियाँ जिनके अंगों से मादकता चूती रहती हों उनका पहले ही विवाह कर दिया जाए अन्यथा वे राजा के भोग विलास के कार्य में लगा दी जायंगी. मगर राजा को उस विशेष प्रकार के धुनकी का नशा लग गया था जिसका सदियों से वैद्य-चिकत्सक आज तक हल निकलने में असमर्थ हैं. अतः, राजा को यह भांपते देर नहीं लगा कि अगर ऐसा होने लगे कि हर नयी फसल को कोई और काट के ले जाएगा तो उसकी मांग कि आपूर्ति में बहुत भीषण समस्या आने लगेगी और उसके इस धुनकी का फिर कोई इलाज़ नहीं हो पायेगा. स्वाभाविक रूप से उसने राज्य में होने वाले हर विवाह कि स्वकृति राजा से लेना आवश्यक कर दिया. इस से राजा को एक और फायदा हो गया. जैसे भीषण गर्मी में सूखे जंगल के सभी प्यासे विवश जीव जंतु पानी पीने के लिए जान जोखिम में डाले उसी घाट पर आते हैं जहाँ शेर आराम से बैठा रहता है और फिर शेर को शिकार करने के लिए ज्यादा दूर तक दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है, उसी तरह से अब उसे राज्य में जवानी के दहलीज़ रखती हर कलियाँ जिसे फूल बनाया जा सकता था उनकी जानकारी उसे बैठे बिठाये मिलने लगा.
अंततोगत्वा इस तरह के व्यवस्था में जैसा होता है, प्रजा ने घुटने टेक दिए और राजा से अनुरोध किया कि अब वह जो निर्णय देंगे वो उन्हें स्वीकार्य होगा. राजा ने विवश और बजने को तैयार प्रजा कि भावनाओं को समझते हुए मौका पर चौका मार कर इसका पूरा फायदा उठाया और एलान किया कि अब से जवानी के दहलीज़ में रख चुकी, गदराई हुयी सुंदरियां दरबार में स्वंय आ जाये और हर रोज जिस किसी सुंदरी को पसंद किया जाएगा, उसे वह मालामाल कर दिया करेगा. फिर क्या था राजा के दरबार में सुंदरियों के तांते लगने लगा था. अब तो राज-दरबार में शिकायत कि कम आवेदन कि पर्चियां लिए लोग क़तर में घंटो खड़े दिखने लगे. "निवेशकों" के ऐसे भावना को देखते, राजा ने अब अपने उस विशेष दस्ते की आवश्यकता नहीं समझी और उनकी छुट्टी कर दी.
प्रसिद्ध हिंदी चल-चित्र शोले के बुढिया मौसी के कथनानुसार "ये शराब और जुए की आदत किसी की छूटी है आजतक ", तदानुसार, इस विशेष दस्ते की भी बचपन से लग चुकी काम वासना की आदत अब इस कदर बढ़ चुकी थी कि वह इस जीवन काल में ख़तम नहीं होने वाली थी. विशेष दस्ते में कुछेक तो इतने बेचैन हो गए थे कि वे राज्य छोड़ किसी नए ठरकी राजा के ओर पलायन करने की सोचने लगे थे. उधर राजा भी धीरे धीरे इस तरह से रोज रोज आराम से मिलने वाले सुंदरियों से उबने लगा था. कारण दो थे- एक राज्य कि सीमित जनसँख्या के कारण धीरे धीरे उसे अपना स्तर गिरना पड रहा था वही बिना भाग दौड़ किये शिकार मिल जाने से उसके अन्दर अथक प्रयास से मिले सफलता और संतुष्टि कि भावना जागृत नहीं हो पा रही थी. उसे अपने पुराने खोजी दस्ते का ख्याल आया और उसने उन सबों को फिर से राज दरबार में आमंत्रित किया. राजा ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उसे अब वह इस व्यवस्था से उब चुका था और उसे कोई बदलाव चाहिए थी, अतः राज्य के बाहर के कुछ सुंदरियों का भी मज़ा चखने जैसे शौक अब उसे चर्राने लगा है. विशेष दस्ते को यह अत्यंत विचारोद्देतक सुझाव लगा. वे तो इसी तरह के काम के लिए उपयुक्त भी थे एवं ऐसे कामों में उनका अनुभव अतुलनीय था. इस तरह के कार्य में उनकी गहरी अभिरुचि भी थी. राज-कोष से उन्हें विदेश जाने कि व्यवस्था की जाने लगी और वे अलग अलग देशों से जा कर राजा के लिए विदेशी सुंदरियों का चयन कर लाने लगे.
राजा के उबते हुए काम-क्रिया में इस तरह के विदेशी निवेश से एक नयी तरह की लहर दौड़ पडी थी और जिस तरह कॉन्फरन्स में हर शाम के डिनर में मिलने वाले खाने कि प्रतीक्षा होती है, उसी तरह से उसे हर रात के "व्यंजन" का बेसब्री से इंतज़ार रहता था. चूँकि विदेशी सुंदरियाँ इतनी दूरी तय करके आती थीं, उनका जल्द वापस लौटना संभव नहीं होता था, अतः उनका राज महल में ही रहने की व्यवस्था की जाने लगी. सुंदरियाँ अपने रात्रि काल के कार्यक्रम के पश्चात् राजा की विशेष कृपा पाने के लिए अपने देश की विशेष कलाओं का प्रदर्शन करने लगी. राजा अब पूरी तरह से इस तरह के क्रियाओं में लीन रहने लगा था. प्रजा का यह हाल था की मंदिर के घंटे की तरह जब कोई भक्त मंदिर में आ जाये तो बजता था अन्यथा वो बजने के लिए कभी भी तैयार लटका रहता था. विशेष दस्ते की तो वारे न्यारे हो गए थे, अब तो उन्हें विदेशों में तरह तरह के सुंदरियों को सरकारी खर्च पे बजाने का अवसर मिलने लगा था.
सब कुछ वैसे ही चल रहा था जैसा होना चाहिए था, प्रजा की इतनी बज चुकी थी की अब लोगों ने काम काज करना बंद कर दिया था और राज्य में दिन रात महंगाई बढ़ने लगी और लोगों का जीना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा था. राजा दिन पर दिन काम वासनाओं में इतना ज्यादा लीन होने लगा था की उसे समाज का दर्द उसी तरह से समझ में नहीं आ रहा था जैसा हिंदी चल चित्र में बुढी माँ के कराहते दृश्य में हीरो को रोते दिखने के बावजूद अगले दृश्य में उसे अपने प्रेमिका के साथ बरसात के दृश्य में काम-क्रीडा में लीन दिखाया जाता है. ऐसा कहा भी जाता है की जब किसी के दिमाग में काम और वासना सवार हो तो उसे और कुछ भी नज़र नहीं आता है. देश का ये हाल होने लगा था की अब कई विदेशी सुंदरियाँ राजा की विशेष कृपा से धीरे धीरे बसने लगे थे. चूँकि उन्हें लोक लाज का कोई भय नहीं था और उनके आसपास आने वाले नर प्रजाति के अधो-भाग में तनाव जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया स्वतः होती रहती थी, अतः उन्हें हर रात्रि कल में एक पुरुष साथी आराम से मिल जाने लगे, जो अपनी पूरी संपत्ति इनपर न्योछावर करने को तैयार होते थे. धीरे धीरे क्या विवाहित और क्या बूढ़ा और क्या जवान, सभी इन सुंदरियों के पास उसी तरह मंडराने लगे जैसे हलवाई के दुकान में जलेबी के ऊपर मक्खियाँ.
राज्य की सुंदरियाँ में भी, जिन्हें इतना आत्म-विश्वास था की उनके पास विदेशियों से प्रतिस्पर्धा करने योग्य अंग-प्रत्यंग में वो सुडौलपन था जो पुरुषों में स्वतः तनाव पैदा कर सके, उन्होंने भी अपना स्व-रोजगार के अवसर खुद ही खोज निकले. इस तरह सारा राज्य काम वासना के स्वर्णिम युग में था. परन्तु जैसा हर युग में होता आया है , स्वादिष्ट भोजन के बीच एकाध कंकर खाने का जायका ख़राब करने के लिए आ ही जाता है, उसी प्रकार से राजा को उसके मंत्री, जिसकी अहमियत अब तक इतनी काम हो चुकी थी जैसे डिजिटल कैमरा आने के बाद फिल्म रोल, उसे बहुत ज्यादा खुजली होने लगी और उसने जब ऐसे बढ़ते यौन-रोजगार कि शिकायत दे मारी तो राजा ने उस पर वैसे ही जम्हाई मारी जैसे किसी टेस्ट मैच में स्पिनर के मैडेन ओवर पर आती हो. राजा ने झूले पर अंगूर के दाने को चबाते और गोद पर बैठे सुंदरी के उरोजो को दबाते हुए, मंत्री को कुछ सार्थक विषयों पर ध्यान देने जैसे नेक सलाह दे कर खिलखिलाते हुए सुंदरियों के नितम्बों पर हाथ फेरने जैसे आवश्यक कार्य का प्रारंभ कर दिया जिसे देखते ही समझदार मंत्री को अंदाज़ा हो गया था कि आगे राजा अपने शरीर के तने हुए विशेष अंग का विशेष प्रयोग उस सुंदरी पर कुछ ही क्षणों में करने वाले थे और यदि समय रहते वह प्रस्थान न करे तो राजा उसके साथ भी वही करेंगे जो शाब्दिक रूप से वही कहा जायेगा जो उस सुंदरी का होने वाला था अर्थात उसकी भी बजा दी जाएगी. मंत्री एवं अन्य परामर्शकर्ताओं कि उपेक्षा एवं अवहेलना से विक्षिप्त राज-तंत्र कि सभी इकाइयाँ अब मानो मौन व्रत धारण कर अवकाश पर चली गयी थी. राज्य में पूरी तरह से अराजकता फ़ैल गयी थी. जिधर देखो बजने और बजाने का कार्यक्रम चल रहा था.
राज दरबार में कभी मुन्नी तो कभी शीला अपनी जवानी दिखा कर बदनाम हो रही थी और दबंग राजा बिलकुल चुलबुलाते हुए एक के बाद एक हिट दे रहे थे. तभी राज्य से लगा हुआ मधुवन नामक जंगल का खूंखार डाकू कालू लंगड़ा कि मदद लेने लोग जंगल पंहुचे. पहले तो बरसों का दोनों, कमर के ऊपर और नीचे का भूखा कालू लंगड़ा लोगो को देख कर चकित हुआ और सोचा कि गाँव को लूटने के बजाय खुद गाँव वाले लुटने के लिए जंगल चले आये हैं. पहले तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता था कि जिसे देख कर लोग भाग जाते थे आज उसके पास लोग चले आ रहे थे. मगर उसे ये नहीं पता था कि डाकू कालू लंगड़ा तो कभी कभी जंगल से बाहर लूटने को निकलता था मगर राजा तो रोज ही प्रजा कि बजा रहा था. डाकू कालू लंगड़ा पहले तो उत्साहित, फिर प्रसन्न, और फिर विस्मित हुआ और गाँव वालों कि दुःख भरी कहानी सुन कर राजा की किस्मत पर अन्दर से तो बहुत जला, मगर उसके चारो तरफ जब लोगों ने सहायता कि भीख मंगनी शुरू कर दिया तो वो न चाहते हुए भी एक मसीहा बन गया, हालाकि उसे अन्दर से वही करने का मन था जो राजा कर रहा था मगर अब वह बहुत विवश हो गया था. अब वह उसी तरह से अपनी जिम्मेदारियों से बंध गया था जिस तरह हिंदी फिल्म का इंस्पेक्टर. उसने लोगों को बताया कि वह उसे राजा से मुक्ति दिला देगा मगर बदले में उसे राजा कि गद्दी चाहिए थी, लोगों कि हालत ऐसी थी कि शरीर के जितने छिद्र थे उन सबों में राजा ने मानो कुछ कुछ न घुसेड दिया था, अतः उन्हें ये शर्त बिलकुल मान्य हो गयी.
अपने रंग के अनुसार अमावास की रात को डाकू कालू लंगड़ा ने अपने दल के साथ जंगल से राज महल के लिए कूच की. रास्ते में हर जगह लोगों ने उस से डरने की बजाय उसकी स्वागत की और फिर वह जब महल के पास पहुंचा तो पहरेदारों ने भी उसे रोकने की कोशिश की. परन्तु डाकू कालू ने उन सबों को अपनी आगे कि योजना बताई जिसमे उन्हें मालामाल करने की बात फर्श पर गिरे सिक्के की आवाज की तरह उनके कानों में पहुँच गयी थी. उन्होंने राज महल के द्वार को उसी तरह से खोल दिया जिस तरह से राजा हर रात अपने पैजामा कि नाडा खोल देता था. अन्दर जाने के बाद डाकू कालू लंगड़े ने अपने बरसों के अनुभव के आधार पर राजा कि हत्या उतनी ही आसानी से कर दी जितनी आसानी से राजा अपने महल में रोज सुंदरियों की बजाया करता था. सबकुछ इतनी आसानी से हो गया कि किसी को समझ में भी नहीं आया.
डाकू कालू लंगड़ा ने बिना समय व्यर्थ किये अगले ही दिन राज्याभिषेक कि घोषणा कर दी. प्रजा बहुत प्रसन्न थी और लोगों ने राहत की साँस ली कि घोर पापी और असुर स्वाभाव के राजा से उन्हें मुक्ति मिल गयी थी. राज्याभिषेक के दौरान प्रजा को पता चला कि डाकू कालू लंगड़ा असल में उसके व्यवसाय के हिसाब से रखा गया नाम था. उसके भी माँ बाप ने उसेद कोई नाम दी थी जिसे कालांतर में लोगों ने भुला दिया था. उसने प्रजा को बहुत सारे आश्वासन दिए और बड़े बड़े वायदे किये. और इस तरह से डाकू से राजा बन जाने के बाद धीरे धीरे प्रजा कि सुख शांति वापस आने लगी.
तभी पुराने राजा के बनाये विशेष दस्ते ने उसी तरह से कालू लंगड़े के पास पहल कि जिस तरह से पार्क से मूंगफली बेचने वाले पुलिस के द्वारा खदेड़ कर भगा दिए जाने के पश्चात् पुनः प्रकट हो उठता है और फिर से उसे बेचने का प्रयास धीमे स्वर में करता है. पहले तो नए राजा ने इसका पुरजोर विरोश किया और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने की धमकी दी पर जिस तरह डायटिंग कर रहे व्यक्ति के सामने बार बार अच्छे खाने का प्रस्ताव रखा जाए तो बारम्बार ठुकराने के पश्चात अंत में उसका सब्र का बाँध टूट ही जाता है, उसी तरह कालू लंगड़े की भी नीयत बदल गयी. बस फिर क्या था धीरे धीरे महल में पहले जैसी व्यवस्था चालू हो गयी. प्रजा में पहले बहुत निराशा हुयी तत्पश्चात वे सोचने लगे कि कलयुग आ गया है. किसी ने पहले और नए राजा के तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ कर दिया और जिनको जैसा समझ में आया वैसा करने लगे.
और वह प्रथा आज तक चल रही है. कुछ समझदार लोगों ने इस व्यवस्था का नाम लोकतंत्र रख दिया, और लोगों में इस से कुछ संतोष हुआ और फिर सब व्यवस्था यथावत चलती रही, परन्तु लोगों ने अपने अपने त्वचा को काफी मोटी कर ली और अब उन्हें चिकोटी काटने से भी फर्क नहीं पड़ता.