icchadhaari baba
14th February 2011, 10:11 PM
उसकी साड़ी का मुड़ा कोना देख, मेरी आंख में तिनके का जाना याद आता है,
उसका आँचल भीगा पाकर , मुझे डांट कर उसका खुद ही रोना याद आता है,
आँखों में उसकी भी सूजन होती थी,जब मैं रातों को सो न पाता था,
कलाई पर जलने के निशान भी देखे है, जब मैं गरमा गरम पूडियां खाता था,
चमकती आँखें भी देखी हैं उसकी, जो परछाई हुआ करती थी मेरी जीत की,
जिसने गिरने न दिया मुझको कहीं भी, अब भी याद हैं पंक्तियाँ उस गीत की,
लगा देती थी दिल से फरियादों की झड़ी,जब मेरे माथे की शिकन देखती थी,
जिससे कुछ कहने की ज़रूरत ही न थी, वो शायद सीधे मेरा मन देखती थी,
अब मैं नहीं हूँ, तो रातों को,घर के चूल्हे का मंजर सर्द होता है,
आंसू भी नहीं बहाती,कुछ कहती भी नहीं,पर जानता हूँ उसे दर्द होता है,
क्यूंकि उन्हें पोछने वाले हाथ तो, ठंडे हो तिरंगे में लिपटे हुए थे,
उसके जीवन भर के दिए आशीष, उन तीन रंगों में ही सिमटे हुए थे,
मैं दूर जब उससे बात करता था, तो दोनों बस मिलकर खूब हँसते थे,
पर जानता था उन बातों में उसकी,आँखों के कुछ मोती भी बसते थे,
उसे अब वो सास बहू की कहानियां नहीं जँचती,जिसे लेकर हम झगड़ते थे,
अब वो सब्जियां फल भी घर नहीं आते, जो पहले इतने आते थे की सड़ते थे,
वो अपनी पसंद का अब कुछ नहीं खाती,क्यूंकि उसने कभी वो खाया ही नहीं,
मैं सुबह शाम रात क्या खाऊँगा, उसके सिवा उसने कुछ बनाया ही नहीं,
वो पहले मेरी खातिर कई व्रत रखती थी , अब मेरी याद में रोज़ रखती है,
वो अब भी रोज़ थाली सजाती है,और बाहर बैठ मेरा इंतजार करती है,
वो दरवाज़े जो मेरे आने से पहले ही, चहक कर खुल जाया करते थे,
अब कोई आ भी जाये, तो खोलती नहीं उन्हें, वो अकड़ कर बस बंद रहते हैं,
बचपन में बनायीं मेरी तसवीरें ,अब भी बहुत संभाल कर रखती है,
मेरी यादों की निशानियाँ सीने से चिपकाए,युहीं गुमसुम चलती रहती है,
दुनिया मुझे शहीद कहकर आगे बढ़ गयी,पर मैं तो उसका बेटा हूँ,
मुझको राख बना सब भूल गए,पर उसके दिल में मैं अब भी लेटा हूँ,
मैं अमर हुआ इस बात का गर्व तो है,पर दे उसको कुछ भी न सका,
मैं अपनी मिटटी के लिए मर तो गया,पर बस अपनी माँ के लिए जी न सका.....
उसका आँचल भीगा पाकर , मुझे डांट कर उसका खुद ही रोना याद आता है,
आँखों में उसकी भी सूजन होती थी,जब मैं रातों को सो न पाता था,
कलाई पर जलने के निशान भी देखे है, जब मैं गरमा गरम पूडियां खाता था,
चमकती आँखें भी देखी हैं उसकी, जो परछाई हुआ करती थी मेरी जीत की,
जिसने गिरने न दिया मुझको कहीं भी, अब भी याद हैं पंक्तियाँ उस गीत की,
लगा देती थी दिल से फरियादों की झड़ी,जब मेरे माथे की शिकन देखती थी,
जिससे कुछ कहने की ज़रूरत ही न थी, वो शायद सीधे मेरा मन देखती थी,
अब मैं नहीं हूँ, तो रातों को,घर के चूल्हे का मंजर सर्द होता है,
आंसू भी नहीं बहाती,कुछ कहती भी नहीं,पर जानता हूँ उसे दर्द होता है,
क्यूंकि उन्हें पोछने वाले हाथ तो, ठंडे हो तिरंगे में लिपटे हुए थे,
उसके जीवन भर के दिए आशीष, उन तीन रंगों में ही सिमटे हुए थे,
मैं दूर जब उससे बात करता था, तो दोनों बस मिलकर खूब हँसते थे,
पर जानता था उन बातों में उसकी,आँखों के कुछ मोती भी बसते थे,
उसे अब वो सास बहू की कहानियां नहीं जँचती,जिसे लेकर हम झगड़ते थे,
अब वो सब्जियां फल भी घर नहीं आते, जो पहले इतने आते थे की सड़ते थे,
वो अपनी पसंद का अब कुछ नहीं खाती,क्यूंकि उसने कभी वो खाया ही नहीं,
मैं सुबह शाम रात क्या खाऊँगा, उसके सिवा उसने कुछ बनाया ही नहीं,
वो पहले मेरी खातिर कई व्रत रखती थी , अब मेरी याद में रोज़ रखती है,
वो अब भी रोज़ थाली सजाती है,और बाहर बैठ मेरा इंतजार करती है,
वो दरवाज़े जो मेरे आने से पहले ही, चहक कर खुल जाया करते थे,
अब कोई आ भी जाये, तो खोलती नहीं उन्हें, वो अकड़ कर बस बंद रहते हैं,
बचपन में बनायीं मेरी तसवीरें ,अब भी बहुत संभाल कर रखती है,
मेरी यादों की निशानियाँ सीने से चिपकाए,युहीं गुमसुम चलती रहती है,
दुनिया मुझे शहीद कहकर आगे बढ़ गयी,पर मैं तो उसका बेटा हूँ,
मुझको राख बना सब भूल गए,पर उसके दिल में मैं अब भी लेटा हूँ,
मैं अमर हुआ इस बात का गर्व तो है,पर दे उसको कुछ भी न सका,
मैं अपनी मिटटी के लिए मर तो गया,पर बस अपनी माँ के लिए जी न सका.....