icchadhaari baba
18th January 2011, 12:59 PM
समस्त बंधुओं को बाबा का प्रणाम,
ये मेरी सहस्त्र्वीं रचना है. कुछ महानुभावों के निर्देश पर इस रचना का निर्माण हुआ है.
आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा करता हूँ ,कि आप को पसंद आएगी...
सुदूर चेन्नेई प्रदेश में एक छोटा सा गाँव, गाँव में एक झोपड़ी और उस झोपड़ी में रहने वाला एक गरीब मोची,यूँ तो मोची जूते सिलने की कला में माहिर था लेकिन उस गाँव के लोग जूते ही नहीं पहनते थे, यही कारण था की हुनर होते हुए भी मोची को गरीबी में जीवन यापन करना पड़ रहा था, हद तो तब हो गयी की जब उसके पास न खाने को रोटी और पहनने को कपड़े, तन पे बस एक कच्छा, कमजोर दुबला पतला शरीर , सर से बाल गायब, जो बाल बचे भी थे वो हवा चलने पर खडे हो जाते.मोची बहुत परेशान रहने लगा, उसे अन्दर ही अन्दर चिंता सताने लगी की अब मेरा क्या होगा,
उन्ही दिनों गाँव में भयंकर महामारी फ़ैल गयी, पूरा गाँव कीड़ों से भर गया, लोग बीमार होने लगे, सभी गाँव वालों ने मिलकर कीड़े मारने की दवाई मंगाई, कुछ दवाई मोची ने भी ली और लगा गया कीड़े मारने, अब वो कीड़े मारने में भी माहिर हो गया,
किन्तु समस्या अभी वही की वही थी, न खाने को रोटी और न पहनने को कपड़े. गाँव के ही किसी बुजुर्ग ने सलाह दी की गाँव छोड़ के किसी शहर में जाओ और वहीँ अपना धंधा जमाओ,बात मोची को पसंद आई , उसने अपना सुई ,धागा और ओजारों का थैला उठाया और चलने लगा, तभी उसने सोचा कि मैं कीड़े मारने में भी पारंगत हो चुका हूँ शायद कहीं कीड़े मारने का काम ही मिल जाए ,यहो सोच कर उसने अपने थैले में दवाई भी रख ली फिर चल पड़ा शहर कि ओर,चलते चलते मोची एक नगर तक पहुंचा,
नगर बहुत भव्य था नगर के मुख्य द्वार पे एक सिपाही खड़ा था , नगर के भीतर से बच्चों के हंसने ओर खेलने कि आवाजें आ रही थी , कभी -कभी एक चीख भी सुनाई देती , मोची ने सोचा कि क्यों न यहीं अपनी किस्मत आजमाई जाए , ओर वो चल पड़ा मुख्य द्वार कि ओर ......
द्वार पे खडे सिपाही ने मोची को रोका और पूछा...........
सिपाही :- ए रुक ,कौन है तू ,और कहाँ जा रहा है ?
मोची:- जनाब में सिलाई और कीड़े मारने का काम करता हूँ , और यहाँ काम की तलाश में आया हूँ
सिपाही:-भाग यहाँ से , बड़ा आया सिलाई वाला .
यह सुन कर मोची उदास हो गया और नगर के बाहर ही बैठ गया .............
चलिए मोची को यहाँ थोडा विराम देता हूँ ..............
आप को याद होगा की कुछ दिन पहले मैने आप को फंडूलोक की जानकारी दी थी , चलिए वहां चलते हैं ,.............................
फंडूलोक के प्राणी बहुत प्रसन्न रहा करते थे , किन्तु एक समस्या वहां भी थी ,और समस्या भी बहुत गंभीर थी , ....
लौंडेबाज़ जी से प्रेरित हो कर धीरे-धीरे सबने ही नारद का गुदामर्दन करना शुरू कर दिया , इसके लिए एक विशेष प्रकार के कक्ष की स्थापना की गयी, कक्ष का नाम बूंगा-बूंगा कक्ष रखा गया , नित्य ही कोई न कोई नारद को पकड़ कर कक्ष में ले जाता और बूंगा-बूंगा कर देता, नारद की देह जवाब दे गयी थी , प्राण ,देह को त्यागना चाहते थे , लेकिन किसी तरह नारद ने उनको रोका हुआ था ,
स्वामी, बाबा,मुनि,पहलवान,चोर ,सिपाही,राजा,वजीर, सबके ही लिंगो पर नारद की गुदा का रस लग चुका था ,नारद किसी तरह अपनी जान बचाकर नगर के दाहिनी और स्थित कबीले की पीछे वाली पहाड़ियों में छुप गया, नारद की अनुपस्थिति में सभी फंडूलोक वासी परेशान होने लगे , स्थिति इतनी खराब हो गयी की अब मौका मिलते ही कोई भी किसी को भी पकड़ के बूंगा-बूंगा कक्ष में ले जाता और गुदामर्दन कर देता,
एक दिन अलीबाबा पहाड़ी पर घूम रहा था की उसे वहां रक्तरंजित अवस्था में नारद पड़ा मिला , अलीबाबा को नारद पे दया आ गयी और वो नारद को पकड़ के वापिस फंडूलोक में छोड़ गया,
नारद को वापिस देख कर सबके लिंगो पे ख़ुशी की लहर दौड़ गयी,नारद को फूलों का हार पहना कर स्वागत किया गया, नारद की हालत बहुत दयनीय थी,चलने में असमर्थ नारद की गुदा से अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था,करुणामयी स्वामी सम्भोगानंद को नारद की इस अवस्था पे बहुत तरस आया , उन्होने कहा ...............
स्वामी जी :- इस मुर्ख को क्षमा-दान दे देना चाहिए
लौंडेबाज़ :-मुनिवर आप तो इसकी उद्दंडता से भलीभांति परिचित है.इसने कई बार आपके आश्रम में भी उत्पात मचाया है!
स्वामी जी:-आप का कथन सत्य है लौंडेबाज़ जी लेकिन क्या अब आप इसके प्राण भी हरना चाहते हो?
लौंडेबाज़:- मेरे कथा का ये तात्पर्य नहीं है मुनिवर , आप हमारे गुरु और स्वामियों में श्रेष्ठ हैं, आप जो भी निर्णय लेगे हम उसका पालन करेंगे .
स्वामी जी:-ठीक है तो हम ये आज्ञा देते हैं की नारद को बूंगा-बूंगा कक्ष में विश्राम करने दिया जाए और इने स्वास्थ्य लाभ का पूर्ण रूप से ध्यान दिया जाए!
बिल्लो पहलवान , वही पे चुपचाप खड़ा हुआ सब सुन रहा था,वो कुछ नहीं बोला क्योंकि उसने अपने मन में कुछ और ही ठाना हुआ था .
स्वामी सम्भोगानद की आज्ञानुसार नारद को कक्ष में लिटा दिया गया, उनकी सुरक्षा के लिए हवालदार डेंगू को लगाया गया, हवालदार डेंगू और बिल्लो पहलवान की बहुत घनिस्ट मित्रता थी, एक दिन बिल्लो पहलवान के हवालदार डेंगू को सुरा पिला कर मदमस्त कर दिया और कक्ष के भीतर प्रवेश कर लिया, कक्ष के भीतर नारद अपने नितम्बों को आकाश की तरफ उठाये लेटा हुआ था, बिल्लो पहलवान ने नारद का फिर से गुदामर्दन कर दिया,वृहद्लिंग्धारी बिल्लो द्वारा दिए गए इस आघात को नारद सह नहीं पाया और अचेत हो गया,अपने उद्देश्य में सफल होने के बाद बिल्लो वहां से चलता बना, प्रातः होते ही ये सूचना जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी की किसी ने नारद का फिर से गुदामर्दन कर दिया है!
सूर्य की पहली किरण के साथ ही नगर के राजा (जो की बहुत स्टाइल में रहता था,इसलिए सब उनको स्टाइल राजा कहते थे )का सन्देश अखाडा प्रबंधक और आश्रम प्रबन्धक को पहुंचा , सब को राजमहल में एक आम सभा के लिए बुलाया गया ,सभा का नेतृत्व स्वामी सम्भोगानंद जी को सौंपा गया
स्थिति बहुत चिंतनीय थी,स्वामी सम्भोगानंद बोले ............
स्वामी जी:-मेरे मना करने के उपरान्त भी किसी ने उस बालक के साथ कुकर्म किया है.
डेंगू:- मुनिवर में तो सजग होकर सुरक्षा कर रहा था फिर भी पता नहीं किस का इतना साहस कि इस घटना को अंजाम दे गया .
कबीले का राजा:-मेरे कबीले से कल रात कोई भी बाहर नहीं निकला, अर्थात जिसने भी ये कृत्य किया है वो यही कहीं हैं ,
लौंडेबाज़:- मेरे दल का कोई भी सदस्य मेरी अनुमति के बिना ऐसा कदापि नहीं कर सकता.
बिल्लो पहलवान:- मेरे अखाडे में सभी ब्रहमचारी हैं .
अलीबाबा:-मुनिवर अगर आप आज्ञा दें तो "ए.सी.पी" "प्रदुमन" और "सी.आई.डी" को बुला लाता हूँ..?
महामुनि :- नहीं नहीं उनको ना ही बुलाया जाए तो उचित रहेगा, अगर वो यहाँ आये, तो साथ में "दया" भी आएगा और सबके दरवाजे तोड़ देगा.
मुनि बृहस्पति जो अभी तक शांत बैठे थे , अपनी दाढ़ी पर उँगलियों को नृत्य करते हुए बोले.
मुनि बृहस्पति:-अगर आप सब शांत हो जाएँ तो में कुछ सुझाव दूँ.?
लम्पट :- जी मुनिवर कहिये.
मुनि बृहस्पति:-जैसा कि आप सभी जानते हैं,कि हमारे नगर को सब अच्छी नज़रों से देखते हैं और इसका सम्मान करते हैं,अगर ऐसे में ये बात बाहर वालों को पता चली तो हम "पितामह"को क्या उत्तर देंगे,हमारी क्या इज्ज़त रह जायेगी, मेरी राय यह है कि पहले तो हवालदार डेंगू को झाड़ू लेकर बूंगा-बूंगा कक्ष में भेजा जाये,ये वहां कि दीवार और फर्श पे जो रक्त लगा हुआ है उसको साफ़ करेंगे,ये कुकृत्य किसने किया है इसका पता लेलेराम और जुपिटर लगायेंगे,जंगली कबीले के रजा आप से मेरा अनुरोध है कि कहीं से किसी हकीम या वैध को बुला लाये जो नारद कि फटी हुई गुदा को सिल सके.....
डेंगू:-मुनिवर क्षमा चाहता हूँ , लेकिन मैने कुछ दिनों पहले एक मनुष्य को नगर द्वार पे देखा था,वो कह रहा था कि मैं सिलाई कि कला में माहिर हूँ.
मुनि बृहस्पति:-क्या वो कोई हकीम या वैध है?
डेंगू:-ये तो पता नहीं मुनिवर लेकिन अगर आप आज्ञा दें तो अभी पता लगाता हूँ.
मुनि बृहस्पति:-नहीं-नहीं आप झाड़ू पकड़ो और जल्दी से सफाई का काम करो.जंगली कबीले के राजा आप जाओ और उस का पता लगाओ.
स्टाइल राजा:-मुनिवर की आज्ञा का पालन हो,डेंगू तुम जल्दी जाओ और कक्ष की सफाई करो "पितामह" यात्रा से कभी भी वापिस आ सकते हैं
डेंगू और जंगली कबीले का राजा दोनों ही मुनि बृहस्पति और स्टाइल राजा की आज्ञा लेकर प्रस्थान करते हैं.
जंगली कबीले के राजा अपना सांप हाथ में पकड़ कर मुख्य द्वार की तरफ चल पड़े. द्वार के बाहर ही उन्हे मरणासन्न अवस्था में मोची दिखाई दिया, जंगली राजा ने पूछा........
जंगली राजा:-ऐ ,क्या तुम ही वो हकीम हो जो सिलाई विध्या में पारंगत हो...?
मोची:- सरकार में सिलाई में तो निपुण हूँ,लेकिन में कोई हकीम नहीं.
जंगली राजा:-ओह , ये तो चिंता का विषय है , अच्छा ये बताओ की तुम कहाँ से आये हो ,और यहाँ तुम्हे कौन -कौन जानता है ?
मोची:-जी मैं मद्रास से आया हूँ और यहाँ कोई भी मेरा परिचित नहीं है.
जंगली राजा के होंठों पे कुटिल मुस्कान उभर जाती है,और वो कहते है.
जंगली राजा:-जो मैं कह रहा हु उसको ध्यान से सुनो, नगर के एक निवासी की गुदा फट गयी है और उसकी सिलाई करनी है, तुम इस कला में निपुण हो,तुम मेरे साथ नगर में चलो,और उसकी सिलाई करो.और हाँ किसी को पता न चले की तुम एक मोची हो ,तुम एक हकीम हो और तुम्हारा नाम मद्रासी हकीम है.
मोची:-लेकिन सरकार------------
जंगली राजा:-लेकिन वेकिन कुछ नहीं जितना कहा जाए उतना करो,वरना ये मेरे हाथ में सांप देख रहे हो........?
मोची:-जी सरकार देख रहा हूँ .
जंगली राजा:-हाँ ये काट लेगा.
मोची:-ठीक है सरकार जैसा आप कहो वैसा ही करूँगा.
जंगली राजा:-तुम जितनी भी मेहनत करोगे उसका भुगतान राजकोष से किया जाएगा,और कुल भुगतान में से आधा मेरा होगा,अगर सौ स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं तो पचास तुम्हारी और पचास मेरी.
मोची:-ठीक है सरकार ,ले चलो जहाँ भी ले जाना है.
जंगली राजा मोची(जो कि अब मद्रासी हकीम बन चुका था) को लेकर स्टाइल राजा के समक्ष प्रस्तुत होते हैं,
जंगली राजा:-महाराज मैं हकीम को ले आया हूँ.
स्टाइल राजा:-हकीम जी आपका क्या नाम है.?
मद्रासी हकीम:-महाराज मेरा नाम मद्रासी हकीम है.
स्टाइल राजा:-अच्छा तो आप किस तरह के इलाज़ में माहिर हैं?
मद्रासी हकीम:- जी में कीडे मारने और सिलाई करने में निपुण हूँ.
स्टाइल राजा:-ठीक है .. जंगली जी आप इनको समस्त कार्य भली-भाँती समझा दीजिये.
जंगली राजा:-जो आप कि आज्ञा महाराज.
जंगली राजा मद्रासी हकीम को लेकर बूंगा-बूंगा कक्ष की तरफ चल पड़ते हैं............................................... .................................................. .
शेष भाग अगले अंक में.......................
ये मेरी सहस्त्र्वीं रचना है. कुछ महानुभावों के निर्देश पर इस रचना का निर्माण हुआ है.
आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा करता हूँ ,कि आप को पसंद आएगी...
सुदूर चेन्नेई प्रदेश में एक छोटा सा गाँव, गाँव में एक झोपड़ी और उस झोपड़ी में रहने वाला एक गरीब मोची,यूँ तो मोची जूते सिलने की कला में माहिर था लेकिन उस गाँव के लोग जूते ही नहीं पहनते थे, यही कारण था की हुनर होते हुए भी मोची को गरीबी में जीवन यापन करना पड़ रहा था, हद तो तब हो गयी की जब उसके पास न खाने को रोटी और पहनने को कपड़े, तन पे बस एक कच्छा, कमजोर दुबला पतला शरीर , सर से बाल गायब, जो बाल बचे भी थे वो हवा चलने पर खडे हो जाते.मोची बहुत परेशान रहने लगा, उसे अन्दर ही अन्दर चिंता सताने लगी की अब मेरा क्या होगा,
उन्ही दिनों गाँव में भयंकर महामारी फ़ैल गयी, पूरा गाँव कीड़ों से भर गया, लोग बीमार होने लगे, सभी गाँव वालों ने मिलकर कीड़े मारने की दवाई मंगाई, कुछ दवाई मोची ने भी ली और लगा गया कीड़े मारने, अब वो कीड़े मारने में भी माहिर हो गया,
किन्तु समस्या अभी वही की वही थी, न खाने को रोटी और न पहनने को कपड़े. गाँव के ही किसी बुजुर्ग ने सलाह दी की गाँव छोड़ के किसी शहर में जाओ और वहीँ अपना धंधा जमाओ,बात मोची को पसंद आई , उसने अपना सुई ,धागा और ओजारों का थैला उठाया और चलने लगा, तभी उसने सोचा कि मैं कीड़े मारने में भी पारंगत हो चुका हूँ शायद कहीं कीड़े मारने का काम ही मिल जाए ,यहो सोच कर उसने अपने थैले में दवाई भी रख ली फिर चल पड़ा शहर कि ओर,चलते चलते मोची एक नगर तक पहुंचा,
नगर बहुत भव्य था नगर के मुख्य द्वार पे एक सिपाही खड़ा था , नगर के भीतर से बच्चों के हंसने ओर खेलने कि आवाजें आ रही थी , कभी -कभी एक चीख भी सुनाई देती , मोची ने सोचा कि क्यों न यहीं अपनी किस्मत आजमाई जाए , ओर वो चल पड़ा मुख्य द्वार कि ओर ......
द्वार पे खडे सिपाही ने मोची को रोका और पूछा...........
सिपाही :- ए रुक ,कौन है तू ,और कहाँ जा रहा है ?
मोची:- जनाब में सिलाई और कीड़े मारने का काम करता हूँ , और यहाँ काम की तलाश में आया हूँ
सिपाही:-भाग यहाँ से , बड़ा आया सिलाई वाला .
यह सुन कर मोची उदास हो गया और नगर के बाहर ही बैठ गया .............
चलिए मोची को यहाँ थोडा विराम देता हूँ ..............
आप को याद होगा की कुछ दिन पहले मैने आप को फंडूलोक की जानकारी दी थी , चलिए वहां चलते हैं ,.............................
फंडूलोक के प्राणी बहुत प्रसन्न रहा करते थे , किन्तु एक समस्या वहां भी थी ,और समस्या भी बहुत गंभीर थी , ....
लौंडेबाज़ जी से प्रेरित हो कर धीरे-धीरे सबने ही नारद का गुदामर्दन करना शुरू कर दिया , इसके लिए एक विशेष प्रकार के कक्ष की स्थापना की गयी, कक्ष का नाम बूंगा-बूंगा कक्ष रखा गया , नित्य ही कोई न कोई नारद को पकड़ कर कक्ष में ले जाता और बूंगा-बूंगा कर देता, नारद की देह जवाब दे गयी थी , प्राण ,देह को त्यागना चाहते थे , लेकिन किसी तरह नारद ने उनको रोका हुआ था ,
स्वामी, बाबा,मुनि,पहलवान,चोर ,सिपाही,राजा,वजीर, सबके ही लिंगो पर नारद की गुदा का रस लग चुका था ,नारद किसी तरह अपनी जान बचाकर नगर के दाहिनी और स्थित कबीले की पीछे वाली पहाड़ियों में छुप गया, नारद की अनुपस्थिति में सभी फंडूलोक वासी परेशान होने लगे , स्थिति इतनी खराब हो गयी की अब मौका मिलते ही कोई भी किसी को भी पकड़ के बूंगा-बूंगा कक्ष में ले जाता और गुदामर्दन कर देता,
एक दिन अलीबाबा पहाड़ी पर घूम रहा था की उसे वहां रक्तरंजित अवस्था में नारद पड़ा मिला , अलीबाबा को नारद पे दया आ गयी और वो नारद को पकड़ के वापिस फंडूलोक में छोड़ गया,
नारद को वापिस देख कर सबके लिंगो पे ख़ुशी की लहर दौड़ गयी,नारद को फूलों का हार पहना कर स्वागत किया गया, नारद की हालत बहुत दयनीय थी,चलने में असमर्थ नारद की गुदा से अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था,करुणामयी स्वामी सम्भोगानंद को नारद की इस अवस्था पे बहुत तरस आया , उन्होने कहा ...............
स्वामी जी :- इस मुर्ख को क्षमा-दान दे देना चाहिए
लौंडेबाज़ :-मुनिवर आप तो इसकी उद्दंडता से भलीभांति परिचित है.इसने कई बार आपके आश्रम में भी उत्पात मचाया है!
स्वामी जी:-आप का कथन सत्य है लौंडेबाज़ जी लेकिन क्या अब आप इसके प्राण भी हरना चाहते हो?
लौंडेबाज़:- मेरे कथा का ये तात्पर्य नहीं है मुनिवर , आप हमारे गुरु और स्वामियों में श्रेष्ठ हैं, आप जो भी निर्णय लेगे हम उसका पालन करेंगे .
स्वामी जी:-ठीक है तो हम ये आज्ञा देते हैं की नारद को बूंगा-बूंगा कक्ष में विश्राम करने दिया जाए और इने स्वास्थ्य लाभ का पूर्ण रूप से ध्यान दिया जाए!
बिल्लो पहलवान , वही पे चुपचाप खड़ा हुआ सब सुन रहा था,वो कुछ नहीं बोला क्योंकि उसने अपने मन में कुछ और ही ठाना हुआ था .
स्वामी सम्भोगानद की आज्ञानुसार नारद को कक्ष में लिटा दिया गया, उनकी सुरक्षा के लिए हवालदार डेंगू को लगाया गया, हवालदार डेंगू और बिल्लो पहलवान की बहुत घनिस्ट मित्रता थी, एक दिन बिल्लो पहलवान के हवालदार डेंगू को सुरा पिला कर मदमस्त कर दिया और कक्ष के भीतर प्रवेश कर लिया, कक्ष के भीतर नारद अपने नितम्बों को आकाश की तरफ उठाये लेटा हुआ था, बिल्लो पहलवान ने नारद का फिर से गुदामर्दन कर दिया,वृहद्लिंग्धारी बिल्लो द्वारा दिए गए इस आघात को नारद सह नहीं पाया और अचेत हो गया,अपने उद्देश्य में सफल होने के बाद बिल्लो वहां से चलता बना, प्रातः होते ही ये सूचना जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी की किसी ने नारद का फिर से गुदामर्दन कर दिया है!
सूर्य की पहली किरण के साथ ही नगर के राजा (जो की बहुत स्टाइल में रहता था,इसलिए सब उनको स्टाइल राजा कहते थे )का सन्देश अखाडा प्रबंधक और आश्रम प्रबन्धक को पहुंचा , सब को राजमहल में एक आम सभा के लिए बुलाया गया ,सभा का नेतृत्व स्वामी सम्भोगानंद जी को सौंपा गया
स्थिति बहुत चिंतनीय थी,स्वामी सम्भोगानंद बोले ............
स्वामी जी:-मेरे मना करने के उपरान्त भी किसी ने उस बालक के साथ कुकर्म किया है.
डेंगू:- मुनिवर में तो सजग होकर सुरक्षा कर रहा था फिर भी पता नहीं किस का इतना साहस कि इस घटना को अंजाम दे गया .
कबीले का राजा:-मेरे कबीले से कल रात कोई भी बाहर नहीं निकला, अर्थात जिसने भी ये कृत्य किया है वो यही कहीं हैं ,
लौंडेबाज़:- मेरे दल का कोई भी सदस्य मेरी अनुमति के बिना ऐसा कदापि नहीं कर सकता.
बिल्लो पहलवान:- मेरे अखाडे में सभी ब्रहमचारी हैं .
अलीबाबा:-मुनिवर अगर आप आज्ञा दें तो "ए.सी.पी" "प्रदुमन" और "सी.आई.डी" को बुला लाता हूँ..?
महामुनि :- नहीं नहीं उनको ना ही बुलाया जाए तो उचित रहेगा, अगर वो यहाँ आये, तो साथ में "दया" भी आएगा और सबके दरवाजे तोड़ देगा.
मुनि बृहस्पति जो अभी तक शांत बैठे थे , अपनी दाढ़ी पर उँगलियों को नृत्य करते हुए बोले.
मुनि बृहस्पति:-अगर आप सब शांत हो जाएँ तो में कुछ सुझाव दूँ.?
लम्पट :- जी मुनिवर कहिये.
मुनि बृहस्पति:-जैसा कि आप सभी जानते हैं,कि हमारे नगर को सब अच्छी नज़रों से देखते हैं और इसका सम्मान करते हैं,अगर ऐसे में ये बात बाहर वालों को पता चली तो हम "पितामह"को क्या उत्तर देंगे,हमारी क्या इज्ज़त रह जायेगी, मेरी राय यह है कि पहले तो हवालदार डेंगू को झाड़ू लेकर बूंगा-बूंगा कक्ष में भेजा जाये,ये वहां कि दीवार और फर्श पे जो रक्त लगा हुआ है उसको साफ़ करेंगे,ये कुकृत्य किसने किया है इसका पता लेलेराम और जुपिटर लगायेंगे,जंगली कबीले के रजा आप से मेरा अनुरोध है कि कहीं से किसी हकीम या वैध को बुला लाये जो नारद कि फटी हुई गुदा को सिल सके.....
डेंगू:-मुनिवर क्षमा चाहता हूँ , लेकिन मैने कुछ दिनों पहले एक मनुष्य को नगर द्वार पे देखा था,वो कह रहा था कि मैं सिलाई कि कला में माहिर हूँ.
मुनि बृहस्पति:-क्या वो कोई हकीम या वैध है?
डेंगू:-ये तो पता नहीं मुनिवर लेकिन अगर आप आज्ञा दें तो अभी पता लगाता हूँ.
मुनि बृहस्पति:-नहीं-नहीं आप झाड़ू पकड़ो और जल्दी से सफाई का काम करो.जंगली कबीले के राजा आप जाओ और उस का पता लगाओ.
स्टाइल राजा:-मुनिवर की आज्ञा का पालन हो,डेंगू तुम जल्दी जाओ और कक्ष की सफाई करो "पितामह" यात्रा से कभी भी वापिस आ सकते हैं
डेंगू और जंगली कबीले का राजा दोनों ही मुनि बृहस्पति और स्टाइल राजा की आज्ञा लेकर प्रस्थान करते हैं.
जंगली कबीले के राजा अपना सांप हाथ में पकड़ कर मुख्य द्वार की तरफ चल पड़े. द्वार के बाहर ही उन्हे मरणासन्न अवस्था में मोची दिखाई दिया, जंगली राजा ने पूछा........
जंगली राजा:-ऐ ,क्या तुम ही वो हकीम हो जो सिलाई विध्या में पारंगत हो...?
मोची:- सरकार में सिलाई में तो निपुण हूँ,लेकिन में कोई हकीम नहीं.
जंगली राजा:-ओह , ये तो चिंता का विषय है , अच्छा ये बताओ की तुम कहाँ से आये हो ,और यहाँ तुम्हे कौन -कौन जानता है ?
मोची:-जी मैं मद्रास से आया हूँ और यहाँ कोई भी मेरा परिचित नहीं है.
जंगली राजा के होंठों पे कुटिल मुस्कान उभर जाती है,और वो कहते है.
जंगली राजा:-जो मैं कह रहा हु उसको ध्यान से सुनो, नगर के एक निवासी की गुदा फट गयी है और उसकी सिलाई करनी है, तुम इस कला में निपुण हो,तुम मेरे साथ नगर में चलो,और उसकी सिलाई करो.और हाँ किसी को पता न चले की तुम एक मोची हो ,तुम एक हकीम हो और तुम्हारा नाम मद्रासी हकीम है.
मोची:-लेकिन सरकार------------
जंगली राजा:-लेकिन वेकिन कुछ नहीं जितना कहा जाए उतना करो,वरना ये मेरे हाथ में सांप देख रहे हो........?
मोची:-जी सरकार देख रहा हूँ .
जंगली राजा:-हाँ ये काट लेगा.
मोची:-ठीक है सरकार जैसा आप कहो वैसा ही करूँगा.
जंगली राजा:-तुम जितनी भी मेहनत करोगे उसका भुगतान राजकोष से किया जाएगा,और कुल भुगतान में से आधा मेरा होगा,अगर सौ स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं तो पचास तुम्हारी और पचास मेरी.
मोची:-ठीक है सरकार ,ले चलो जहाँ भी ले जाना है.
जंगली राजा मोची(जो कि अब मद्रासी हकीम बन चुका था) को लेकर स्टाइल राजा के समक्ष प्रस्तुत होते हैं,
जंगली राजा:-महाराज मैं हकीम को ले आया हूँ.
स्टाइल राजा:-हकीम जी आपका क्या नाम है.?
मद्रासी हकीम:-महाराज मेरा नाम मद्रासी हकीम है.
स्टाइल राजा:-अच्छा तो आप किस तरह के इलाज़ में माहिर हैं?
मद्रासी हकीम:- जी में कीडे मारने और सिलाई करने में निपुण हूँ.
स्टाइल राजा:-ठीक है .. जंगली जी आप इनको समस्त कार्य भली-भाँती समझा दीजिये.
जंगली राजा:-जो आप कि आज्ञा महाराज.
जंगली राजा मद्रासी हकीम को लेकर बूंगा-बूंगा कक्ष की तरफ चल पड़ते हैं............................................... .................................................. .
शेष भाग अगले अंक में.......................