icchadhaari baba
31st December 2010, 08:14 PM
समस्त फंडूज़ोन वासियों को इच्छाधारी बाबा का प्रणाम
आप सभी का प्यार पा कर अति प्रसन्नता हुई , आप में से कुछ बंधुओं ने मुझे ख़त भी लिखा, और कहा की बाबा जी आगे भी ऐसी रचनाएं प्रस्तुत करता रहूँ !
तो बंधुओं मैने सोचा की कुछ ऐसा लिखूं की जो सब को कुछ सीख प्रदान करे!
जो मैने सोचा आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ .
आज की कहानी का विषय है सयानापन, जिसे कई तरह से प्रस्तुत किया जाता है , जैसे की सयान्पंती,या स्यानपती , आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि "ज्यादा सयाना मत बन ", " सयान्पंती मत दिखा" या "सयान्पंती गांड में घुसा दूंगा",.... इस तरह के भद्दे शब्द कई बार कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले प्राणी इस्तेमाल करते हैं. खैर जाने दीजिये ऐसे मूर्खों को , मैं वापिस अपने विषय पे आता हूँ .
बहुत समय पुरानी बात है , फंडू लोक नाम का एक गाँव था , उस गाँव में बहुत खुशहाली थी, वहां हर तरह के प्राणी रहते थे , ऋषि, मुनि, स्वामी, बाबा, उनके भक्त, कुछ शिष्या भी थीं.
नगर के मुख्य द्वार पर एक पुलिस थाना था, जिस पर सब इंस्पेक्टर जुपिटर , और हवालदार डेंगू का स्वामित्व था ,
नगर के उत्तरी छोर पर एक जंगली राजा का कबीला था ,कबीले का सरदार जंगली राजा अक्सर नगर आया -जाया करता था ,
कबीले की पीछे वाली पहाड़ियों पर चोरों का सरदार अलीबाबा अपने चालीस चोरों के साथ रहता था , जब कभी सब इंस्पेक्टर जुपिटर और हवालदार डेंगू थाने से नदारद रहते वो कबीले और नगर दोनों जह लूट पात करता था .
नगर के मध्य में स्वामी सम्भोगानंद का आश्रम था, आश्रम में मुनि बृहस्पति,मह्रिषी मस्तराम, महामुनि, इच्छाधारी बाबा , तथा जामुन वाले बाबा रहते थे
सब अलग अलग विद्याओं में माहिर थे, स्वामी सम्भिगानंद व मुनि बृहस्पति जहाँ बहुत सीधे और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले थे मह्रिषी मस्तराम कोक शास्त्र में पारंगत थे ,
इच्छाधारी बाबा समाज का कल्याण करते थे और जामुन वाले बाबा अक्सर जामुन के पेड़ से जामुन तोड़ कर लाया करते थे .
आश्रम से कुछ ही दूरी पर बिल्लो पहलवान का अखाडा था , जहाँ फूटी किस्मत और लम्पट अक्षर दीक्षा ग्रहण करने जाते थे ,
अखाडा प्रबंधन और आश्रम प्रबंधन का आपस में बहुत मेल भाव था , समय पडने पर वे सदा एक दूसरे कि सहायता करते,
नगर में कुछ बच्चे भी थे जो कभी आश्रम में और कभी अखाडे में हुडदंग मचाया करते , इन सभी बच्चो के चहल कदमी देख कर सब लोग प्रसन्न होते , लेकिन इन्ही बच्चों में एक बहुत उद्दंड और कपटी बालक नारद भी था , जो सदा ही उद्दंडता करता , कभी आश्रम में जलती तीली डाल देता , कभी अखाडे में टट्टी कर देता , नारद कि इन हरकतों से सब परेशान रहते और हमेशा उसको सबक सिखाने कि सोचते , लेकिन नारण गच्चा दे जाता .
नगर के ही कुछ लड़कों ने एक गुट बनाया और नारद को सबक सिखाने कि सोची .
गुट का नाम रखा गया बाज़ परिवार , गुट का मुखिया बना लौंडेबाज़ तथा गुट के अन्य सदस्य क्रमश:- लौंडियाबाज़, पंगेबाज़ , ऊँगलीबाज़, व लौंडे बाज़ थे !
अब जब भी मौका मिलता बाज़ परिवार नारद को पकड़ कर लौंडेबाज़ के समक्ष प्रस्तुत करते और लौंडेबाज़, नारद का गुदा मर्दन कर देते,ऐसा नित्य ही होने लगा , तंग आकर नारद थाने में शिकायत करने गया तो वहां भी जुपिटर और डेंगू ने नारद की स्टेटमेंट ले ली, नारद को जब कुछ नहीं सूझा तो वो जंगली राजा के पास गया, जंगली राजा जो कि हमेशा अपने पास सांप रखते थे उन्होने नारद को सांप दिखा कर डरा दिया, फिर नारद अलीबाबा के पास गया लेकिन अलीबाबा ने भी बाज़ परिवार से बैर नहीं लिया और कहा मेरा नाम भी आज से अलीबाज़ है,
नारद उदास मन से वापस आ गया , उसने अपने आप को बदलने की ठानी , और सब से कहा की मैं अब उद्दंडता नहीं करूँगा लेकिन नारद की किसी ने नहीं सुनी ,
जब भी मौका मिलता बाज़ परिवार नारद का गुदामर्दन कर देता, नारद की गुदा से अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा, गुदा फट चुकी थी , नगर के ही किसी भले मानुष ने नारद को मद्रासी हकीम के दवाखाने तक पहुँचाया, मद्रासी हकीम जो की अपनी विद्या मैं पारंगत था , उसने नारद की गुदा की सिलाई कर के पहले जैसा तरो -ताजा बना दिया.
नारद अब जहाँ भी बाज़ परिवार को देखता अपना रास्ता बदल देता.
समय बीतता गया , लौंडेबाज़ भी इस सब से ऊब चुके थे , उन्होने सोचा की क्यों ना देश की सेवा की जाए , और यह सोच कर उन्होने सेना मैं शामिल होने का निर्णय लिया,
उनका सेना के लिए चयन भी हो गया , पूरे बाज़ परिवार ने उनको बधाई दी और उनको नगर के द्वार तक छोडने आये,
लौंडेबाज़ जी तन और मन से देश की सेवा करने लगे , लेकिन उनको कभी -कभी नारद की याद आ जाती तो उनका लिंग ज़ोर मरने लगता. लेकिन वो अपना मन मसोस कर रह जाते.
उधर लौंडेबाज़ के जाते ही बाज़ परिवार कमजोर पड़ गया और नारद फिर से अपने पुराने रंग मैं आ गया , फिर से वही मस्ती , वही माचिश की तिल्ली,वही अखाडे मैं टट्टी .
समय किसी के रोके से नहीं रुकता , दो वर्ष कैसे बीते कुछ पता ही नहीं चला .
लौंडेबाज़ जी को भी दो महीने की छुट्टी मिल गयी थी , वो भी अपना बोरिया बिस्तर उठा कर जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे तो देखते हैं की बहुत कुछ बदल चूका है , हरे भरे खेत , खेत मैं लगा हुआ पानी का पम्प, पक्की सड़क , उनका दिल खुश हो गया,
सोचा इतनी दूर से आया हूँ , खेत में ताजा पानी चल रहा है थोडा नहा लेता हूँ .
लौंडेबाज़ जी ने अपने कपडे उतारे और नंगा ही नहाने लगे , नहाने के बाद वो खेत में ही पेड़ के नीचे लेट गए , ठंडी हवा चल रही थी , उनकी आँख लग गयी , अब लौंडेबाज़ जी फिर से नारद की गुदा के सपने देखने लगे , उनका लिंग तन कर खड़ा हो गया .
इतने में नारद उधर से गुजरा, जो की अपने आप को बहुत सयाना समझता था ,जैसे ही नारद की निगाह लौंडेबाज़ के लिंग पर पड़ी उसके मन में शरारत सूझी.
नारद ने पास के ही एक खेत से ,( जिसमें की ताजा ताजा हल चलाया गया था) दो मिटटी के बड़े बड़े डले उठाये और लौंडेबाज़ की कमर के दोनों तरफ रख दिए , उसके बाद नारद ने अपनी चड्डी उतारी और इस तरह से डले के ऊपर बैठा की नारद की गुदा ठीक लौंडेबाज़ के लिंग के ऊपर आ गयी , नारद ने सोचा की अब में लिंग के ऊपर टट्टी कर देता हूँ , यह सोचकर नारद ने जोर लगाया , जोर लगते ही मिटटी के डले फूट गए और नारद नीचे की ओर खिसका , खिसकते ही लौंडेबाज़ का लिंग नारद की गुदा में समा गया , हडबडा कर लौंडेबाज़ भी नींद से जागे , ओर चिल्लाने लगे
लौंडेबाज़:- क्या हुआ , क्या हुआ
नारद :- कुछ नहीं हुआ, सयानपंती गांड में घुस गयी !
आप सभी का प्यार पा कर अति प्रसन्नता हुई , आप में से कुछ बंधुओं ने मुझे ख़त भी लिखा, और कहा की बाबा जी आगे भी ऐसी रचनाएं प्रस्तुत करता रहूँ !
तो बंधुओं मैने सोचा की कुछ ऐसा लिखूं की जो सब को कुछ सीख प्रदान करे!
जो मैने सोचा आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ .
आज की कहानी का विषय है सयानापन, जिसे कई तरह से प्रस्तुत किया जाता है , जैसे की सयान्पंती,या स्यानपती , आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि "ज्यादा सयाना मत बन ", " सयान्पंती मत दिखा" या "सयान्पंती गांड में घुसा दूंगा",.... इस तरह के भद्दे शब्द कई बार कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले प्राणी इस्तेमाल करते हैं. खैर जाने दीजिये ऐसे मूर्खों को , मैं वापिस अपने विषय पे आता हूँ .
बहुत समय पुरानी बात है , फंडू लोक नाम का एक गाँव था , उस गाँव में बहुत खुशहाली थी, वहां हर तरह के प्राणी रहते थे , ऋषि, मुनि, स्वामी, बाबा, उनके भक्त, कुछ शिष्या भी थीं.
नगर के मुख्य द्वार पर एक पुलिस थाना था, जिस पर सब इंस्पेक्टर जुपिटर , और हवालदार डेंगू का स्वामित्व था ,
नगर के उत्तरी छोर पर एक जंगली राजा का कबीला था ,कबीले का सरदार जंगली राजा अक्सर नगर आया -जाया करता था ,
कबीले की पीछे वाली पहाड़ियों पर चोरों का सरदार अलीबाबा अपने चालीस चोरों के साथ रहता था , जब कभी सब इंस्पेक्टर जुपिटर और हवालदार डेंगू थाने से नदारद रहते वो कबीले और नगर दोनों जह लूट पात करता था .
नगर के मध्य में स्वामी सम्भोगानंद का आश्रम था, आश्रम में मुनि बृहस्पति,मह्रिषी मस्तराम, महामुनि, इच्छाधारी बाबा , तथा जामुन वाले बाबा रहते थे
सब अलग अलग विद्याओं में माहिर थे, स्वामी सम्भिगानंद व मुनि बृहस्पति जहाँ बहुत सीधे और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले थे मह्रिषी मस्तराम कोक शास्त्र में पारंगत थे ,
इच्छाधारी बाबा समाज का कल्याण करते थे और जामुन वाले बाबा अक्सर जामुन के पेड़ से जामुन तोड़ कर लाया करते थे .
आश्रम से कुछ ही दूरी पर बिल्लो पहलवान का अखाडा था , जहाँ फूटी किस्मत और लम्पट अक्षर दीक्षा ग्रहण करने जाते थे ,
अखाडा प्रबंधन और आश्रम प्रबंधन का आपस में बहुत मेल भाव था , समय पडने पर वे सदा एक दूसरे कि सहायता करते,
नगर में कुछ बच्चे भी थे जो कभी आश्रम में और कभी अखाडे में हुडदंग मचाया करते , इन सभी बच्चो के चहल कदमी देख कर सब लोग प्रसन्न होते , लेकिन इन्ही बच्चों में एक बहुत उद्दंड और कपटी बालक नारद भी था , जो सदा ही उद्दंडता करता , कभी आश्रम में जलती तीली डाल देता , कभी अखाडे में टट्टी कर देता , नारद कि इन हरकतों से सब परेशान रहते और हमेशा उसको सबक सिखाने कि सोचते , लेकिन नारण गच्चा दे जाता .
नगर के ही कुछ लड़कों ने एक गुट बनाया और नारद को सबक सिखाने कि सोची .
गुट का नाम रखा गया बाज़ परिवार , गुट का मुखिया बना लौंडेबाज़ तथा गुट के अन्य सदस्य क्रमश:- लौंडियाबाज़, पंगेबाज़ , ऊँगलीबाज़, व लौंडे बाज़ थे !
अब जब भी मौका मिलता बाज़ परिवार नारद को पकड़ कर लौंडेबाज़ के समक्ष प्रस्तुत करते और लौंडेबाज़, नारद का गुदा मर्दन कर देते,ऐसा नित्य ही होने लगा , तंग आकर नारद थाने में शिकायत करने गया तो वहां भी जुपिटर और डेंगू ने नारद की स्टेटमेंट ले ली, नारद को जब कुछ नहीं सूझा तो वो जंगली राजा के पास गया, जंगली राजा जो कि हमेशा अपने पास सांप रखते थे उन्होने नारद को सांप दिखा कर डरा दिया, फिर नारद अलीबाबा के पास गया लेकिन अलीबाबा ने भी बाज़ परिवार से बैर नहीं लिया और कहा मेरा नाम भी आज से अलीबाज़ है,
नारद उदास मन से वापस आ गया , उसने अपने आप को बदलने की ठानी , और सब से कहा की मैं अब उद्दंडता नहीं करूँगा लेकिन नारद की किसी ने नहीं सुनी ,
जब भी मौका मिलता बाज़ परिवार नारद का गुदामर्दन कर देता, नारद की गुदा से अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा, गुदा फट चुकी थी , नगर के ही किसी भले मानुष ने नारद को मद्रासी हकीम के दवाखाने तक पहुँचाया, मद्रासी हकीम जो की अपनी विद्या मैं पारंगत था , उसने नारद की गुदा की सिलाई कर के पहले जैसा तरो -ताजा बना दिया.
नारद अब जहाँ भी बाज़ परिवार को देखता अपना रास्ता बदल देता.
समय बीतता गया , लौंडेबाज़ भी इस सब से ऊब चुके थे , उन्होने सोचा की क्यों ना देश की सेवा की जाए , और यह सोच कर उन्होने सेना मैं शामिल होने का निर्णय लिया,
उनका सेना के लिए चयन भी हो गया , पूरे बाज़ परिवार ने उनको बधाई दी और उनको नगर के द्वार तक छोडने आये,
लौंडेबाज़ जी तन और मन से देश की सेवा करने लगे , लेकिन उनको कभी -कभी नारद की याद आ जाती तो उनका लिंग ज़ोर मरने लगता. लेकिन वो अपना मन मसोस कर रह जाते.
उधर लौंडेबाज़ के जाते ही बाज़ परिवार कमजोर पड़ गया और नारद फिर से अपने पुराने रंग मैं आ गया , फिर से वही मस्ती , वही माचिश की तिल्ली,वही अखाडे मैं टट्टी .
समय किसी के रोके से नहीं रुकता , दो वर्ष कैसे बीते कुछ पता ही नहीं चला .
लौंडेबाज़ जी को भी दो महीने की छुट्टी मिल गयी थी , वो भी अपना बोरिया बिस्तर उठा कर जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे तो देखते हैं की बहुत कुछ बदल चूका है , हरे भरे खेत , खेत मैं लगा हुआ पानी का पम्प, पक्की सड़क , उनका दिल खुश हो गया,
सोचा इतनी दूर से आया हूँ , खेत में ताजा पानी चल रहा है थोडा नहा लेता हूँ .
लौंडेबाज़ जी ने अपने कपडे उतारे और नंगा ही नहाने लगे , नहाने के बाद वो खेत में ही पेड़ के नीचे लेट गए , ठंडी हवा चल रही थी , उनकी आँख लग गयी , अब लौंडेबाज़ जी फिर से नारद की गुदा के सपने देखने लगे , उनका लिंग तन कर खड़ा हो गया .
इतने में नारद उधर से गुजरा, जो की अपने आप को बहुत सयाना समझता था ,जैसे ही नारद की निगाह लौंडेबाज़ के लिंग पर पड़ी उसके मन में शरारत सूझी.
नारद ने पास के ही एक खेत से ,( जिसमें की ताजा ताजा हल चलाया गया था) दो मिटटी के बड़े बड़े डले उठाये और लौंडेबाज़ की कमर के दोनों तरफ रख दिए , उसके बाद नारद ने अपनी चड्डी उतारी और इस तरह से डले के ऊपर बैठा की नारद की गुदा ठीक लौंडेबाज़ के लिंग के ऊपर आ गयी , नारद ने सोचा की अब में लिंग के ऊपर टट्टी कर देता हूँ , यह सोचकर नारद ने जोर लगाया , जोर लगते ही मिटटी के डले फूट गए और नारद नीचे की ओर खिसका , खिसकते ही लौंडेबाज़ का लिंग नारद की गुदा में समा गया , हडबडा कर लौंडेबाज़ भी नींद से जागे , ओर चिल्लाने लगे
लौंडेबाज़:- क्या हुआ , क्या हुआ
नारद :- कुछ नहीं हुआ, सयानपंती गांड में घुस गयी !