mastraam
18th April 2009, 06:27 PM
मच्छर वैसे तो खून चूसने के लिए मशहूर हैं, लेकिन तथ्य यह है कि ज्यादातर समय यह फूलों का रस ही चूसते हैं।
अमेरिका स्थित जार्जिया सदर्न यूनिवर्सिटी के थामस कोलार्स मच्छरों की इस आदत और फूलों के प्रति उनके आकर्षण का इस्तेमाल मलेरिया, डेंगू, यलो फीवर जैसे रोग फैलाने वाले मच्छरों को पकड़ने-मारने में करने का प्रयास कर रहे हैं।
इसके लिए कोलार्स ने नीले, हरे, लाल, पीले रंगों के फूलों के आकार के प्लास्टिक के सूक्ष्म पिंजरे तैयार किए हैं। यह रंग आमतौर पर मच्छरों को लुभाते हैं। पिंजरे के बीच में एक तश्तरी पर मीठा द्रव रखा जाता है, जिसमें एक बैक्टीरिया का विष घुला होता है।
यह वास्तव में एक कीटाणुनाशी है जो मच्छरों को मारने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। एक पतली जाली की मदद से अन्य कीटों को अंदर आने से रोका जाता है और सिर्फ मच्छरों की सूंड इस पिंजरे के अंदर घुस पाती है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग के दौरान यह यंत्र मच्छरों को मारने में सफल रहा। कोलार्स अब इसका परीक्षण प्रयोगशाला के बाहर मैदानी परिस्थिति में करने जा रहे हैं।
-Dainik jagran
अमेरिका स्थित जार्जिया सदर्न यूनिवर्सिटी के थामस कोलार्स मच्छरों की इस आदत और फूलों के प्रति उनके आकर्षण का इस्तेमाल मलेरिया, डेंगू, यलो फीवर जैसे रोग फैलाने वाले मच्छरों को पकड़ने-मारने में करने का प्रयास कर रहे हैं।
इसके लिए कोलार्स ने नीले, हरे, लाल, पीले रंगों के फूलों के आकार के प्लास्टिक के सूक्ष्म पिंजरे तैयार किए हैं। यह रंग आमतौर पर मच्छरों को लुभाते हैं। पिंजरे के बीच में एक तश्तरी पर मीठा द्रव रखा जाता है, जिसमें एक बैक्टीरिया का विष घुला होता है।
यह वास्तव में एक कीटाणुनाशी है जो मच्छरों को मारने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। एक पतली जाली की मदद से अन्य कीटों को अंदर आने से रोका जाता है और सिर्फ मच्छरों की सूंड इस पिंजरे के अंदर घुस पाती है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग के दौरान यह यंत्र मच्छरों को मारने में सफल रहा। कोलार्स अब इसका परीक्षण प्रयोगशाला के बाहर मैदानी परिस्थिति में करने जा रहे हैं।
-Dainik jagran