lampat
5th April 2009, 12:08 PM
कायदे से आम चुनाव में स्विस बैंकों में जमा भारतीयों की ब्लैक मनी को देश वापस लाना एक बड़ा मुद्दा होना चाहिए था, लेकिन हैरानी की बात है कि एक दो राजनीतिक पार्टियों और कुछ गिने-चुने राजनेताओं व लोकप्रिय शख्सियतों के अलावा इस मुद्दे को कोई तूल ही नहीं दे रहा है। हद तो यह है कि जिन लोगों ने इस मुद्दे को उठाया भी है उन्होंने भी महज रस्म अदायगी ही की है। आखिर स्विस बैंकों में जमा लगभग 1500 अरब डालर किन लोगों के है? जाहिर है कि यह धन जिन भी भारतीयों का होगा उन्हे देश और देशहित से कोई लेना-देना नहीं है। सवाल उठता है कि फिर देश के बहुसंख्यक राजनेता, राजनीतिक पार्टियां, गैर-राजनीतिक संगठन के प्रबुद्ध जन इसके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठा रहे? क्यों इसे एक जनांदोलन की शक्ल देने की कोशिश नहीं की जा रही? कहीं इस उदासीनता के पीछे एक बड़ी वजह यह तो नहीं है कि इस धन में उनका भी हिस्सा हो जिनसे हम आवाज उठाने की अपेक्षा कर रहे हैं। यह भी एक तमाचे से कम नहीं है कि दुनिया के निर्धनतम देशों की सूची में शामिल हिंदुस्तान वह देश है जहां का सबसे ज्यादा काला धन स्विट्जरलैंड के बैंकों में जमा है। यह 1456 अरब डालर से लेकर 1500 अरब डालर के आसपास है।
अगर स्विस बैंकों में जमा किया गया यह काला धन देश वापस आ जाता है तो किस तरह भारत की आर्थिक काया पलट हो सकती है। देश पर महज 155 अरब डालर का कर्ज है। यह कर्ज न सिर्फ एक झटके में इस काले धन से अदा किया जा सकता है, बल्कि इसके बाद भी 10 गुना से ज्यादा पैसा शेष बच जाएगा। इससे अगर देश का विकास किया जाए तो पूरे हिंदुस्तान की कायापलट की जा सकती है। स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा काले धन को देश में लाकर अगर बैंक में ही जमा कर दिया जाए तो उससे मिलने वाले ब्याज से ही हर साल देश के 20 जिलों को पूरी तरह से विकसित किया जा सकता है। इस तरह महज आठ सालों में सिर्फ इस काले धन के ब्याज से ही पूरे देश का आर्थिक कायाकल्प हो सकता है।
स्विट्जरलैंड में पिछली 4 शताब्दियों से ही गुप्त बैंक खातों का चलन रहा है। हालांकि समय-समय पर इन स्विस बैंकों के गुप्त खातों का पैसा कई देश वापस हासिल भी करते रहे है, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसी कठोर नीतियां बनाई गईं जिसके चलते कोई भी देश इन बैंकों में मौजूद खातों की जानकारियां नहीं हासिल कर पाया है। पिछले एक साल से पूरी दुनिया में कसता मंदी का शिकंजा एक ऐसा अवसर लेकर आया है जिसके चलते स्विट्जरलैंड की सरकार अपने यहां बैंकों में जमा गुप्त धन को बताने के लिए मजबूर हो सकती है। दरअसल स्विट्जरलैंड सहित दुनिया में 50 से ज्यादा ऐसे देश हैं जहां काला धन रखने वालों को भारी सुविधाएं मिलती हैं। उनसे टैक्स नहीं वसूला जाता और उल्टे कुछ फायदा भी दिया जाता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया के खरबों डालर स्विट्जरलैंड सहित ऐसे तमाम देशों में जमा हो गए है जहां इस तरह की गुप्त पूंजी के लिए अनुकूल सुविधाएं मिल रही है। मंदी के चलते अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्विट्जरलैंड को मजबूर कर दिया है कि वह उनके देश के कर चोरों के बेनामी गुप्त खातों को उजागर करे। अमेरिका के दबाव में स्विट्जरलैंड इसके लिए तैयार हो गया है और स्विस बैंक एसोसिएशन द्वारा जारी प्रारंभिक सूचना के मुताबिक जिन 5 देशों के सबसे ज्यादा बेनामी पैसे यहां की बैंकों में जमा है उनमें सबसे ऊपर नाम भारत का है। स्विस बैंकों में भारत के 1456 अरब डालर 2006 के अंत तक जमा थे, जिनके अब बढ़कर 1500 अरब डालर से भी ज्यादा होने का अनुमान है। भारत के बाद दूसरे नंबर पर रूस है जिसके 470 अरब डालर यहां की बैंकों में जमा हैं। ब्रिटेन के 390, यूक्रेन के 100 और चीन के 96 अरब डालर यहां की बैंकों में जमा है।
अगर स्विट्जरलैंड अमेरिका के दबाव में अमेरिकी खातों को उजागर कर सकता है तो फिर वह भारतीयों के खाते क्यों नहीं उजागर कर सकता? वैसे भी इस समय तो भारत और अमेरिका का दोस्ताना ऐसा है कि अमेरिका खुद भी दबाव डालकर यह करवा सकता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, जनता दल के शरद यादव और योग गुरु रामदेव के अलावा इस मुद्दे पर किसी ने भी खुलकर कुछ नहीं कहा है। यहां तक कि कांग्रेस के कपिल सिबल ने उलटे यह सवाल उठाया है कि जब भाजपा सत्ता में थी तो इस काले धन को वापस लाने की बात क्यों नहीं की? कपिल सिबल भूल गए कि पहले कभी स्विस सरकार ने आधिकारिक रूप से यह बताया ही नहीं था कि भारत का पैसा उसके बैंकों में जमा है और वह कितना है। वक्त आ गया है कि इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगाना छोड़कर राजनीतिक दल स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाएं और इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करे।
Source: jagran (http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_5366044.html)
अगर स्विस बैंकों में जमा किया गया यह काला धन देश वापस आ जाता है तो किस तरह भारत की आर्थिक काया पलट हो सकती है। देश पर महज 155 अरब डालर का कर्ज है। यह कर्ज न सिर्फ एक झटके में इस काले धन से अदा किया जा सकता है, बल्कि इसके बाद भी 10 गुना से ज्यादा पैसा शेष बच जाएगा। इससे अगर देश का विकास किया जाए तो पूरे हिंदुस्तान की कायापलट की जा सकती है। स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा काले धन को देश में लाकर अगर बैंक में ही जमा कर दिया जाए तो उससे मिलने वाले ब्याज से ही हर साल देश के 20 जिलों को पूरी तरह से विकसित किया जा सकता है। इस तरह महज आठ सालों में सिर्फ इस काले धन के ब्याज से ही पूरे देश का आर्थिक कायाकल्प हो सकता है।
स्विट्जरलैंड में पिछली 4 शताब्दियों से ही गुप्त बैंक खातों का चलन रहा है। हालांकि समय-समय पर इन स्विस बैंकों के गुप्त खातों का पैसा कई देश वापस हासिल भी करते रहे है, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसी कठोर नीतियां बनाई गईं जिसके चलते कोई भी देश इन बैंकों में मौजूद खातों की जानकारियां नहीं हासिल कर पाया है। पिछले एक साल से पूरी दुनिया में कसता मंदी का शिकंजा एक ऐसा अवसर लेकर आया है जिसके चलते स्विट्जरलैंड की सरकार अपने यहां बैंकों में जमा गुप्त धन को बताने के लिए मजबूर हो सकती है। दरअसल स्विट्जरलैंड सहित दुनिया में 50 से ज्यादा ऐसे देश हैं जहां काला धन रखने वालों को भारी सुविधाएं मिलती हैं। उनसे टैक्स नहीं वसूला जाता और उल्टे कुछ फायदा भी दिया जाता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया के खरबों डालर स्विट्जरलैंड सहित ऐसे तमाम देशों में जमा हो गए है जहां इस तरह की गुप्त पूंजी के लिए अनुकूल सुविधाएं मिल रही है। मंदी के चलते अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्विट्जरलैंड को मजबूर कर दिया है कि वह उनके देश के कर चोरों के बेनामी गुप्त खातों को उजागर करे। अमेरिका के दबाव में स्विट्जरलैंड इसके लिए तैयार हो गया है और स्विस बैंक एसोसिएशन द्वारा जारी प्रारंभिक सूचना के मुताबिक जिन 5 देशों के सबसे ज्यादा बेनामी पैसे यहां की बैंकों में जमा है उनमें सबसे ऊपर नाम भारत का है। स्विस बैंकों में भारत के 1456 अरब डालर 2006 के अंत तक जमा थे, जिनके अब बढ़कर 1500 अरब डालर से भी ज्यादा होने का अनुमान है। भारत के बाद दूसरे नंबर पर रूस है जिसके 470 अरब डालर यहां की बैंकों में जमा हैं। ब्रिटेन के 390, यूक्रेन के 100 और चीन के 96 अरब डालर यहां की बैंकों में जमा है।
अगर स्विट्जरलैंड अमेरिका के दबाव में अमेरिकी खातों को उजागर कर सकता है तो फिर वह भारतीयों के खाते क्यों नहीं उजागर कर सकता? वैसे भी इस समय तो भारत और अमेरिका का दोस्ताना ऐसा है कि अमेरिका खुद भी दबाव डालकर यह करवा सकता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, जनता दल के शरद यादव और योग गुरु रामदेव के अलावा इस मुद्दे पर किसी ने भी खुलकर कुछ नहीं कहा है। यहां तक कि कांग्रेस के कपिल सिबल ने उलटे यह सवाल उठाया है कि जब भाजपा सत्ता में थी तो इस काले धन को वापस लाने की बात क्यों नहीं की? कपिल सिबल भूल गए कि पहले कभी स्विस सरकार ने आधिकारिक रूप से यह बताया ही नहीं था कि भारत का पैसा उसके बैंकों में जमा है और वह कितना है। वक्त आ गया है कि इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगाना छोड़कर राजनीतिक दल स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाएं और इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करे।
Source: jagran (http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_5366044.html)