lampat
11th January 2009, 07:53 AM
मधुसूदन आनन्द
कुछ हफ्ते पहले मैंने एक लेख लिखा था जिसमें यह बताने की कोशिश की गई थी कि भले ही
देश और समाज हमें कायर समझे लेकिन हम एक राष्ट्र के रूप में मुंबई बम कांड का बदला लेने के लिए पाकिस्तान पर किसी प्रकार की कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। यह भी कि जब तक पाकिस्तान में सचमुच का लोकतंत्र नहीं आ जाता, तब तक कुछ नहीं बदलेगा और हमें दूसरे आतंकवादी हमले के लिए तैयार रहना होगा। इस लेख पर अनेक पाठकों की नाराज लेकिन ईमानदार प्रतिक्रियाएं मिलीं। उनका स्वागत है लेकिन इनसे मेरी पूर्व स्थापनाओं में कोई बदलाव फिलहाल नहीं आया है और मैं अब भी जोर देकर कहूंगा कि कूटनीतिक दबाव और दुनिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करके ही उसे माकूल कार्रवाई के लिए मजबूर किया जा सकता है।
युद्ध लड़ना हमारे राष्ट्रीय स्वभाव में ही नहीं है। युद्ध प्राय: हम पर लादे ही गए हैं। यह अलग बात है कि पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हमारे बहादुर जवानों ने अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया लेकिन चीन ने 1962 में हमें पराजित ही किया। कई सैन्य विशेषज्ञों ने 1965 के युद्ध को बराबरी का युद्ध तक माना है, लेकिन 1971 का युद्ध निश्चय ही पाकिस्तान को मिला ऐसा जबर्दस्त आघात है, जिसका दर्द उसे आज भी रह-रहकर सालता है। जो भी हो भारत युद्ध पिपासु देश नहीं है। युद्ध जैसे हालात हों, तब भी भारत के लोगों के सामान्य जीवन और व्यवहार पर कोई असर नहीं पड़ता। आप 26 नवंबर के बाद के कुछ दिनों को छोड़ दीजिए तो पाएंगे कि समूचा देश जैसे अपने क्षुद्र कार्यों स्वार्थों और हानि-लाभ के दायरे में ही फंसा पड़ा है और सिर्फ टीवी चैनल ही पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाने और कागजी लड़ाई लड़ने के काम में हलकान हो रहे हैं। हमारे राजनैतिक नेतृत्व की तो और भी बुरी हालत है।
संकट के समय हर राजनैतिक पार्टी के नेता का यह फर्ज हो जाता है कि वह एक स्वर में बात करे। पार्टी के बजाए देश के एक नेता के रूप में। पांच विधानसभाओं के चुनाव अभियान के दौरान हमारे बड़े-बड़े नेताओं ने अपनी औकात दिखा दी। और तो और अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने तो मुंबई में शहीद हुए तीन पुलिस अधिकारियों का मामला उठाकर पाकिस्तान के हाथ में एक मजबूत तर्क दे दिया और अपनी ही सरकार को संकट में डाल दिया।
क्या देश पर आए संकट के दौरान कोई नेता इस तरह का आचरण कर सकता है? जाहिर है अंतुले जब यह बयान दे रहे थे तब उनके सामने देश हित के बजाए पार्टी हित और अपने वोट बैंक के सरोकार प्रमुख थे। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह जैसे नेता अंतुले के सुर में सुर मिला रहे थे। प्रियंका गांधी यह कहकर कि यदि मेरी दादी इंदिरा गांधी होतीं तो ऐसा नहीं हो सकता था, अपने ही नेता मनमोहन सिंह की सीमाएं बता रही थीं। इंदिरा गांधी जैसा साहसी और दूरदर्शी नेता आजाद भारत में शायद पैदा नहीं हुआ है, मगर संकट के समय देश का मनोबल बनाने की जरूरत होती है, उसे तोड़ने की नहीं। ऐसा आचरण दिखाने की जरूरत होती है जिससे लगे कि हमारे नेता देश और सिर्फ देश के बारे में सोच रहे हैं।
क्या कभी किसी ने ऐसा सोचा होगा कि हमारे पूर्व उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत अचानक अपने राजनैतिक निर्वात से बाहर निकलकर लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी को चुनौती देंगे? इसे कहते हैं सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठमलट्ठा। इसमें जरा भी शक नहीं कि बीजेपी को इस जगह तक पहुंचाने वाले लालकृष्ण आडवाणी हैं। पार्टी और एनडीए दोनों ने उनकी दावेदारी को स्वीकार कर लिया है। फिर यह अचानक चुनौती क्यों? इस समय आडवाणी को चुनौती देने के बजाए अगर शेखावत अपनी तथाकथित राष्ट्रप्रेम की सोल एजेंट पार्टी के नवयुवकों- नवयुवतियों में सचमुच राष्ट्रप्रेम भरने का कोई बड़ा रचनात्मक कार्यक्रम चलाते तो उनकी गरिमा बढ़ती। लेकिन वे तो शतरंज का खेल खेल रहे हैं और उनका निशाना आडवाणी के मोहरे पर है। कहने वाले कह रहे हैं उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से अपना हिसाब चुकता करना है।
अमर सिंह-मुलायम सिंह, मनमोहन सरकार को परमाणु समझौते के मामले में बचाने के लिए जब आगे आए थे, तभी लोगों को लगा था कि दाल में कुछ काला है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में मुलायम और उनका परिवार फंसा हुआ था। उसे समर्थन के बदले में कुछ राहत मिल गई। अब जब शिकंजा फिर कसता दिखाई दे रहा है तो कहा जा रहा है कि या तो पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करो, नहीं तो समर्थन वापस। यानी या तो हमें बचाओ या फिर जाओ जहन्नुम में। क्या देश प्रेम का जज्बा है!
मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता, करुणानिधि, नवीन पटनायक, विलासराव देशमुख और नारायण राणे सरीखे नेताओं को तो जगत गति शायद व्याप्ति ही नहीं। जैसे उनका भारत उनके राज्य की सीमा से बाहर हो ही नहीं। कहीं पार्टी के लिए धन उगाहने के लिए किसी इंजीनियर को निर्ममतापूर्वक मारा जा रहा है तो कहीं मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने पर पार्टी हाईकमान को कोसा जा रहा है। कहीं विदेशमंत्री को तलब किया जा रहा है कि श्रीलंका सरकार को धमकाकर राजीव गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार लिट्टे को बचाया जाए तो कहीं एक मुख्यमंत्री अपनी शर्मनाक हार के बाद कह रहा है, एक बार और चुनाव लडूंगा। मुझे राज्य में नहीं तो केंद्र में कुर्सी देना इस देश का धर्म है क्योंकि मैं सरकार को समर्थन दे रहा हूं। क्या ऐसे सत्ता लोलुप नेताओं के सहारे आप पाकिस्तान से लड़ेंगे? भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की तो मैं बात ही नहीं कर रहा।
और देखिए खाते-पीते परिवारों के लोग माने जाने वाले तेलकर्मियों ने देश की कनपटी पर ऐसे संकट के दिनों में पिस्तौल रख दी। देश में पेट्रॉल-डीजल की सप्लाई रुक गई। सब जगह हाहाकार मच गया और गृहमंत्री पी. चिदंबरम् को अपनी वॉशिंगटन यात्रा तक स्थगित करनी पड़ी। वे मुंबई बमकांड में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत लेकर अमेरिका जानेवाले थे और इस यात्रा का उद्देश्य पाकिस्तान पर और दबाव डलवाना था। पहले से ही एक संकट से जूझ रहे देश का सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त करने वाले लोगों को आप क्या कहेंगे? क्या ऐसे संवेदनहीन कर्मचारियों के बल पर कोई देश लड़ने का फैसला कर सकता है? ट्रकों की हड़ताल कराने वाले संवेदनहीन लोगों को क्या कोई एहसास है? असम के बम विस्फोटों की तो मैं चर्चा ही नहीं कर रहा लेकिन पुंछ में करीब नौ दिनों तक आतंकवादियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के नाम पर सेना को क्या मिला? बाबा जी का घंटा। बजाते रहो।
Source: Navbharat Times (http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3961178.cms)
Madhusoodan Anand is chief editor of Navbharat Times
कुछ हफ्ते पहले मैंने एक लेख लिखा था जिसमें यह बताने की कोशिश की गई थी कि भले ही
देश और समाज हमें कायर समझे लेकिन हम एक राष्ट्र के रूप में मुंबई बम कांड का बदला लेने के लिए पाकिस्तान पर किसी प्रकार की कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। यह भी कि जब तक पाकिस्तान में सचमुच का लोकतंत्र नहीं आ जाता, तब तक कुछ नहीं बदलेगा और हमें दूसरे आतंकवादी हमले के लिए तैयार रहना होगा। इस लेख पर अनेक पाठकों की नाराज लेकिन ईमानदार प्रतिक्रियाएं मिलीं। उनका स्वागत है लेकिन इनसे मेरी पूर्व स्थापनाओं में कोई बदलाव फिलहाल नहीं आया है और मैं अब भी जोर देकर कहूंगा कि कूटनीतिक दबाव और दुनिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करके ही उसे माकूल कार्रवाई के लिए मजबूर किया जा सकता है।
युद्ध लड़ना हमारे राष्ट्रीय स्वभाव में ही नहीं है। युद्ध प्राय: हम पर लादे ही गए हैं। यह अलग बात है कि पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हमारे बहादुर जवानों ने अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया लेकिन चीन ने 1962 में हमें पराजित ही किया। कई सैन्य विशेषज्ञों ने 1965 के युद्ध को बराबरी का युद्ध तक माना है, लेकिन 1971 का युद्ध निश्चय ही पाकिस्तान को मिला ऐसा जबर्दस्त आघात है, जिसका दर्द उसे आज भी रह-रहकर सालता है। जो भी हो भारत युद्ध पिपासु देश नहीं है। युद्ध जैसे हालात हों, तब भी भारत के लोगों के सामान्य जीवन और व्यवहार पर कोई असर नहीं पड़ता। आप 26 नवंबर के बाद के कुछ दिनों को छोड़ दीजिए तो पाएंगे कि समूचा देश जैसे अपने क्षुद्र कार्यों स्वार्थों और हानि-लाभ के दायरे में ही फंसा पड़ा है और सिर्फ टीवी चैनल ही पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाने और कागजी लड़ाई लड़ने के काम में हलकान हो रहे हैं। हमारे राजनैतिक नेतृत्व की तो और भी बुरी हालत है।
संकट के समय हर राजनैतिक पार्टी के नेता का यह फर्ज हो जाता है कि वह एक स्वर में बात करे। पार्टी के बजाए देश के एक नेता के रूप में। पांच विधानसभाओं के चुनाव अभियान के दौरान हमारे बड़े-बड़े नेताओं ने अपनी औकात दिखा दी। और तो और अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने तो मुंबई में शहीद हुए तीन पुलिस अधिकारियों का मामला उठाकर पाकिस्तान के हाथ में एक मजबूत तर्क दे दिया और अपनी ही सरकार को संकट में डाल दिया।
क्या देश पर आए संकट के दौरान कोई नेता इस तरह का आचरण कर सकता है? जाहिर है अंतुले जब यह बयान दे रहे थे तब उनके सामने देश हित के बजाए पार्टी हित और अपने वोट बैंक के सरोकार प्रमुख थे। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह जैसे नेता अंतुले के सुर में सुर मिला रहे थे। प्रियंका गांधी यह कहकर कि यदि मेरी दादी इंदिरा गांधी होतीं तो ऐसा नहीं हो सकता था, अपने ही नेता मनमोहन सिंह की सीमाएं बता रही थीं। इंदिरा गांधी जैसा साहसी और दूरदर्शी नेता आजाद भारत में शायद पैदा नहीं हुआ है, मगर संकट के समय देश का मनोबल बनाने की जरूरत होती है, उसे तोड़ने की नहीं। ऐसा आचरण दिखाने की जरूरत होती है जिससे लगे कि हमारे नेता देश और सिर्फ देश के बारे में सोच रहे हैं।
क्या कभी किसी ने ऐसा सोचा होगा कि हमारे पूर्व उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत अचानक अपने राजनैतिक निर्वात से बाहर निकलकर लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी को चुनौती देंगे? इसे कहते हैं सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठमलट्ठा। इसमें जरा भी शक नहीं कि बीजेपी को इस जगह तक पहुंचाने वाले लालकृष्ण आडवाणी हैं। पार्टी और एनडीए दोनों ने उनकी दावेदारी को स्वीकार कर लिया है। फिर यह अचानक चुनौती क्यों? इस समय आडवाणी को चुनौती देने के बजाए अगर शेखावत अपनी तथाकथित राष्ट्रप्रेम की सोल एजेंट पार्टी के नवयुवकों- नवयुवतियों में सचमुच राष्ट्रप्रेम भरने का कोई बड़ा रचनात्मक कार्यक्रम चलाते तो उनकी गरिमा बढ़ती। लेकिन वे तो शतरंज का खेल खेल रहे हैं और उनका निशाना आडवाणी के मोहरे पर है। कहने वाले कह रहे हैं उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से अपना हिसाब चुकता करना है।
अमर सिंह-मुलायम सिंह, मनमोहन सरकार को परमाणु समझौते के मामले में बचाने के लिए जब आगे आए थे, तभी लोगों को लगा था कि दाल में कुछ काला है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में मुलायम और उनका परिवार फंसा हुआ था। उसे समर्थन के बदले में कुछ राहत मिल गई। अब जब शिकंजा फिर कसता दिखाई दे रहा है तो कहा जा रहा है कि या तो पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करो, नहीं तो समर्थन वापस। यानी या तो हमें बचाओ या फिर जाओ जहन्नुम में। क्या देश प्रेम का जज्बा है!
मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता, करुणानिधि, नवीन पटनायक, विलासराव देशमुख और नारायण राणे सरीखे नेताओं को तो जगत गति शायद व्याप्ति ही नहीं। जैसे उनका भारत उनके राज्य की सीमा से बाहर हो ही नहीं। कहीं पार्टी के लिए धन उगाहने के लिए किसी इंजीनियर को निर्ममतापूर्वक मारा जा रहा है तो कहीं मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने पर पार्टी हाईकमान को कोसा जा रहा है। कहीं विदेशमंत्री को तलब किया जा रहा है कि श्रीलंका सरकार को धमकाकर राजीव गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार लिट्टे को बचाया जाए तो कहीं एक मुख्यमंत्री अपनी शर्मनाक हार के बाद कह रहा है, एक बार और चुनाव लडूंगा। मुझे राज्य में नहीं तो केंद्र में कुर्सी देना इस देश का धर्म है क्योंकि मैं सरकार को समर्थन दे रहा हूं। क्या ऐसे सत्ता लोलुप नेताओं के सहारे आप पाकिस्तान से लड़ेंगे? भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की तो मैं बात ही नहीं कर रहा।
और देखिए खाते-पीते परिवारों के लोग माने जाने वाले तेलकर्मियों ने देश की कनपटी पर ऐसे संकट के दिनों में पिस्तौल रख दी। देश में पेट्रॉल-डीजल की सप्लाई रुक गई। सब जगह हाहाकार मच गया और गृहमंत्री पी. चिदंबरम् को अपनी वॉशिंगटन यात्रा तक स्थगित करनी पड़ी। वे मुंबई बमकांड में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत लेकर अमेरिका जानेवाले थे और इस यात्रा का उद्देश्य पाकिस्तान पर और दबाव डलवाना था। पहले से ही एक संकट से जूझ रहे देश का सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त करने वाले लोगों को आप क्या कहेंगे? क्या ऐसे संवेदनहीन कर्मचारियों के बल पर कोई देश लड़ने का फैसला कर सकता है? ट्रकों की हड़ताल कराने वाले संवेदनहीन लोगों को क्या कोई एहसास है? असम के बम विस्फोटों की तो मैं चर्चा ही नहीं कर रहा लेकिन पुंछ में करीब नौ दिनों तक आतंकवादियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के नाम पर सेना को क्या मिला? बाबा जी का घंटा। बजाते रहो।
Source: Navbharat Times (http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3961178.cms)
Madhusoodan Anand is chief editor of Navbharat Times