Mahamuni
27th August 2008, 12:10 PM
परवेज़ मुशर्रफ से ज्यादा कौन खुश होगा, इस समय? उन्होंने राष्ट्रपति की कुर्सी क्या छोड़ी, पाकिस्तान में महाभारत शुरू हो गया। आसिफ अली जरदारी और मियां नवाज शरीफ ने मिलकर मुशर्रफ के खिलाफ सेमी फाइनल लड़ा और जीत गए। अब फाइनल मैच शुरू हो गया है। यह मैच होगा जरदारी और नवाज के बीच। दोनों अपने-अपने मोहरे बहुत संभलकर चल रहे हैं लेकिन लगता है कि जरदारी मात खा जाएंगे और लोकतंत्र का यह मिला-जुला दौर बहुत ही अल्पजीवी साबित होगा।
जो आसिफ जरदारी संसद के मामूली सदस्य भी नहीं हैं, उन्हें उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए नामजद कर दिया है। ये वे ही जरदारी हैं जिन्हें उनकी अपनी पत्नी ने इस लायक भी नहीं समझा कि पीपल्स पार्टी का अध्यक्ष बना दें। बेनजीर भुट्टो ने अपने बेटे बिलावल को अध्यक्ष और पति जरदारी को उपाध्यक्ष नामजद किया। पता नहीं, क्या गणित बिठाकर जरदारी राष्ट्रपति बनने को तैयार हो गए हैं।
एक पाकिस्तानी पत्रकार से उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के नाते वे फौज के सुप्रीम कमांडर होंगे। सेनापतियों से वे सलामी लेंगे। यह उनका बदला होगा। लोकतंत्र का बदला फौजतंत्र से। कितनी बचकानी बात है यह! आज तक क्या पाकिस्तान के किसी गैर फौजी राष्ट्रपति ने फौज के सामने इस तरह अपनी मूंछों पर ताव दिया है? पाकिस्तानी राष्ट्रपतियों की इतनी हैसियत भी नहीं होती कि वे सेनापति को मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन में बुला लें। उन्हें खुद रावलपिंडी के फौजी मुख्यालय में जाना पड़ता है। चुने जाने के पहले ही जरदारी ने फौज को चुनौती दे दी है।
अगर जरदारी सफल हो जाएं तो क्या कहने! राष्ट्रपति बनने में तो जरदारी सफल हो सकते हैं लेकिन उनका राष्ट्रपति बनना उनके लिए आत्मघात से कम नहीं होगा। नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग (एन) के पास सिर्फ 91 सीटें हैं और पंजाब के अलावा किसी भी असेम्बली में उनके पास ज्यादा सीटें नहीं हैं। इसीलिए उनके उम्मीदवार सइदुज्ज्मान सिद्दीकी हार जाएंगे और जरदारी जीतेंगे। लेकिन यह जीत भी क्या जीत होगी? खुद जरदारी ने न्यूजवीक से कहा है कि राष्ट्रपति का पद तो सजावटी होता है।
तो क्या वे अब पलटी खाएंगे और कहेंगे कि मैं उतनी ही शक्तियां भोगूंगा जितनी मुशर्रफ भोगते थे? मुशर्रफ ने सरकार और संसद को भंग करने के अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे। यदि धारा 17 में संशोधन नहीं होगा तो जरदारी मुशर्रफ बन जाएंगे। वे पाकिस्तान के नए तानाशाह होंगे। यह फौज से नहीं, लोकतंत्र से बदला लेना होगा और यदि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपने आपको नखदंतहीन कर लिया तो कल्पना कीजिए कि उनकी हालत क्या होगी?
वे पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के नेता होंगे और उन्हें फौज और प्रधानमंत्री के इशारों पर नाचना होगा। वे दो नावों की सवारी कैसे करेंगे? वे धारा 17 में संशोधन करेंगे तो मारे जाएंगे और नही करेंगे तो भी मरेंगे। राष्ट्रपति का पद उनके लिए कुर्सी नहीं, खांचा साबित होगा। राजनीति के नए खिलाड़ी जरदारी ने अपनी गर्दन खांचे में फंसा ली है।
जरदारी से ज्यादा अक्ल की बात उनके बेटे बिलावल ने कही है। बिलावल ने कहा था कि आतंकवाद और फौज का जवाब हिंसा नहीं, लोकतंत्र है। क्या जरदारी के राष्ट्रपति बनने से लोकतंत्र को बढ़ावा मिलेगा? राष्ट्रपति की उम्मीदवारी ने पाकि स्तानी लोकतंत्र का अंग भंग कर दिया है। मियां नवाज लाख कहें कि वे इस सरकार को गिरने नहीं देंगे और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग देंगे, लेकिन उन्होंने सरकार को दफनाने का पूरा इंतजाम कर दिया है।
दोनों नेताओं के बीच अब बंदूकें सीधी तन गई हैं। सरकार से अलग होना और राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करना आखिर किस बात का सूचक है? मियां नवाज एक तीर से कई शिकार कर रहे हैं। पहला तो यह कि वे जजों की वापसी पर जरदारी के वचनभंग को मुद्दा बना रहे हैं। सारी पाकिस्तानी जनता इस मुद्दे पर नवाज के साथ है। तीन-तीन बार वचन देकर जरदारी पलटी खा गए। वे कहते हैं कि राजनीतिक दलों के समझौते कोई कुरान की आयत की तरह पवित्र नहीं होते।
जरदारी का रवैया उनकी पुरानी सिद्घांतहीनता की छवि को मजबूत करेगा। दूसरा, नवाज के लोगों ने पूरे पाकिस्तान में यह बात फैला दी है कि जरदारी चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी से डरे हुए हैं। जरदारी को डर है कि अगर चौधरी वापस आ गए तो वे मुशर्रफ के उस अध्यादेश को रद्द कर देंगे जिसके कारण बेनजीर और उन्हें मुकदमों से छुट्टी मिली थी। यह बात जरदारी की छवि को चूर-चूर कर रही है।
तीसरा, राष्ट्रपति पद की दुविधा है, यानी जरदारी के गले की फांस को नवाज अब ज्यादा नुकीली बनाएंगे। वे राष्ट्रपति पर अंकुश लगाने का नया आंदोलन छेड़ेंगे। चौथा, उन्होंने सिद्दीकी को अपना उम्मीदवार बनाकर एक साथ कई संदेश दे दिए हैं। सिद्दीकी वही मुख्य न्यायाधीश हैं जिन्होंने नवाज के तख्ता पलट के बाद मुशर्रफ के तहत शपथ लेने से इंकार कर दिया था। उनकी ईमानदारी, साहस और त्याग बहुचर्चित है।
उनके मुकाबले जरदारी जीतेंगे जरूर, नेताओं के वोटों से, लेकिन जनता की नजर में वे हारेंगे। उसका फायदा सीधे नवाज शरीफ को मिलेगा। नवाज लंबी पारी का खेल खेल रहे हैं। यों भी पिछले छह माह में नवाज की छवि एक जिम्मेदार नेता की बन रही है, जबकि जरदारी सौदेबाज के तौर पर उभर रहे हैं। कभी वे अमेरिका से सौदेबाजी करते हुए दिखाई पड़ते थे और कभी मुशर्रफ से। सौदेबाजी तो बेनजीर भुट्टो भी करती रहीं, लेकिन उनमें जुझारू योद्धा के तेवर भी हमेशा बने रहे।
उस दर्जे के योद्धा तो नवाज शरीफ भी नहीं हैं, लेकिन परिस्थितियां उन्हें नए रूप में ढाल रही हैं। यदि वे चौधरी सुजात हुसैन की मुस्लिम लीग (कायदे आजम) के कुछ अपने पुराने साथियों को तोड़ सके और इस सरकार को गिरा सके तो नए चुनाव यानी फाइनल मैच में वे जरदारी को धराशायी कर देंगे, इसमें जरा भी शक नहीं है। लेकिन डर यही है कि इन दोनों बड़े नेताओं की धींगामुश्ती से अगर पाकिस्तान की जनता तंग आ गई तो कहीं फौज खुद ही अखाडे़ में न कूद पड़े।
जो आसिफ जरदारी संसद के मामूली सदस्य भी नहीं हैं, उन्हें उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए नामजद कर दिया है। ये वे ही जरदारी हैं जिन्हें उनकी अपनी पत्नी ने इस लायक भी नहीं समझा कि पीपल्स पार्टी का अध्यक्ष बना दें। बेनजीर भुट्टो ने अपने बेटे बिलावल को अध्यक्ष और पति जरदारी को उपाध्यक्ष नामजद किया। पता नहीं, क्या गणित बिठाकर जरदारी राष्ट्रपति बनने को तैयार हो गए हैं।
एक पाकिस्तानी पत्रकार से उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के नाते वे फौज के सुप्रीम कमांडर होंगे। सेनापतियों से वे सलामी लेंगे। यह उनका बदला होगा। लोकतंत्र का बदला फौजतंत्र से। कितनी बचकानी बात है यह! आज तक क्या पाकिस्तान के किसी गैर फौजी राष्ट्रपति ने फौज के सामने इस तरह अपनी मूंछों पर ताव दिया है? पाकिस्तानी राष्ट्रपतियों की इतनी हैसियत भी नहीं होती कि वे सेनापति को मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन में बुला लें। उन्हें खुद रावलपिंडी के फौजी मुख्यालय में जाना पड़ता है। चुने जाने के पहले ही जरदारी ने फौज को चुनौती दे दी है।
अगर जरदारी सफल हो जाएं तो क्या कहने! राष्ट्रपति बनने में तो जरदारी सफल हो सकते हैं लेकिन उनका राष्ट्रपति बनना उनके लिए आत्मघात से कम नहीं होगा। नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग (एन) के पास सिर्फ 91 सीटें हैं और पंजाब के अलावा किसी भी असेम्बली में उनके पास ज्यादा सीटें नहीं हैं। इसीलिए उनके उम्मीदवार सइदुज्ज्मान सिद्दीकी हार जाएंगे और जरदारी जीतेंगे। लेकिन यह जीत भी क्या जीत होगी? खुद जरदारी ने न्यूजवीक से कहा है कि राष्ट्रपति का पद तो सजावटी होता है।
तो क्या वे अब पलटी खाएंगे और कहेंगे कि मैं उतनी ही शक्तियां भोगूंगा जितनी मुशर्रफ भोगते थे? मुशर्रफ ने सरकार और संसद को भंग करने के अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे। यदि धारा 17 में संशोधन नहीं होगा तो जरदारी मुशर्रफ बन जाएंगे। वे पाकिस्तान के नए तानाशाह होंगे। यह फौज से नहीं, लोकतंत्र से बदला लेना होगा और यदि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपने आपको नखदंतहीन कर लिया तो कल्पना कीजिए कि उनकी हालत क्या होगी?
वे पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के नेता होंगे और उन्हें फौज और प्रधानमंत्री के इशारों पर नाचना होगा। वे दो नावों की सवारी कैसे करेंगे? वे धारा 17 में संशोधन करेंगे तो मारे जाएंगे और नही करेंगे तो भी मरेंगे। राष्ट्रपति का पद उनके लिए कुर्सी नहीं, खांचा साबित होगा। राजनीति के नए खिलाड़ी जरदारी ने अपनी गर्दन खांचे में फंसा ली है।
जरदारी से ज्यादा अक्ल की बात उनके बेटे बिलावल ने कही है। बिलावल ने कहा था कि आतंकवाद और फौज का जवाब हिंसा नहीं, लोकतंत्र है। क्या जरदारी के राष्ट्रपति बनने से लोकतंत्र को बढ़ावा मिलेगा? राष्ट्रपति की उम्मीदवारी ने पाकि स्तानी लोकतंत्र का अंग भंग कर दिया है। मियां नवाज लाख कहें कि वे इस सरकार को गिरने नहीं देंगे और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग देंगे, लेकिन उन्होंने सरकार को दफनाने का पूरा इंतजाम कर दिया है।
दोनों नेताओं के बीच अब बंदूकें सीधी तन गई हैं। सरकार से अलग होना और राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करना आखिर किस बात का सूचक है? मियां नवाज एक तीर से कई शिकार कर रहे हैं। पहला तो यह कि वे जजों की वापसी पर जरदारी के वचनभंग को मुद्दा बना रहे हैं। सारी पाकिस्तानी जनता इस मुद्दे पर नवाज के साथ है। तीन-तीन बार वचन देकर जरदारी पलटी खा गए। वे कहते हैं कि राजनीतिक दलों के समझौते कोई कुरान की आयत की तरह पवित्र नहीं होते।
जरदारी का रवैया उनकी पुरानी सिद्घांतहीनता की छवि को मजबूत करेगा। दूसरा, नवाज के लोगों ने पूरे पाकिस्तान में यह बात फैला दी है कि जरदारी चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी से डरे हुए हैं। जरदारी को डर है कि अगर चौधरी वापस आ गए तो वे मुशर्रफ के उस अध्यादेश को रद्द कर देंगे जिसके कारण बेनजीर और उन्हें मुकदमों से छुट्टी मिली थी। यह बात जरदारी की छवि को चूर-चूर कर रही है।
तीसरा, राष्ट्रपति पद की दुविधा है, यानी जरदारी के गले की फांस को नवाज अब ज्यादा नुकीली बनाएंगे। वे राष्ट्रपति पर अंकुश लगाने का नया आंदोलन छेड़ेंगे। चौथा, उन्होंने सिद्दीकी को अपना उम्मीदवार बनाकर एक साथ कई संदेश दे दिए हैं। सिद्दीकी वही मुख्य न्यायाधीश हैं जिन्होंने नवाज के तख्ता पलट के बाद मुशर्रफ के तहत शपथ लेने से इंकार कर दिया था। उनकी ईमानदारी, साहस और त्याग बहुचर्चित है।
उनके मुकाबले जरदारी जीतेंगे जरूर, नेताओं के वोटों से, लेकिन जनता की नजर में वे हारेंगे। उसका फायदा सीधे नवाज शरीफ को मिलेगा। नवाज लंबी पारी का खेल खेल रहे हैं। यों भी पिछले छह माह में नवाज की छवि एक जिम्मेदार नेता की बन रही है, जबकि जरदारी सौदेबाज के तौर पर उभर रहे हैं। कभी वे अमेरिका से सौदेबाजी करते हुए दिखाई पड़ते थे और कभी मुशर्रफ से। सौदेबाजी तो बेनजीर भुट्टो भी करती रहीं, लेकिन उनमें जुझारू योद्धा के तेवर भी हमेशा बने रहे।
उस दर्जे के योद्धा तो नवाज शरीफ भी नहीं हैं, लेकिन परिस्थितियां उन्हें नए रूप में ढाल रही हैं। यदि वे चौधरी सुजात हुसैन की मुस्लिम लीग (कायदे आजम) के कुछ अपने पुराने साथियों को तोड़ सके और इस सरकार को गिरा सके तो नए चुनाव यानी फाइनल मैच में वे जरदारी को धराशायी कर देंगे, इसमें जरा भी शक नहीं है। लेकिन डर यही है कि इन दोनों बड़े नेताओं की धींगामुश्ती से अगर पाकिस्तान की जनता तंग आ गई तो कहीं फौज खुद ही अखाडे़ में न कूद पड़े।